कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग: 126 डॉलर के पार पहुंचा क्रूड, अब पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ना लगभग तय

Indian Economy: पश्चिम एशिया के गहरे संकट ने भारत की आर्थिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती अनिश्चितता के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 126.41 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। यह पिछले चार वर्षों का उच्चतम स्तर है। इसका सीधा असर आम भारतीयों की जेब पर पड़ना तय माना जा रहा है। घरेलू बाजार में रुपया भी गिरकर 95 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है।

रुपये की ऐतिहासिक गिरावट और आरबीआई की चिंता

मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गुरुवार को 95.34 के स्तर तक लुढ़क गया। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के हस्तक्षेप के बाद बाजार बंद होने तक यह 94.84 पर टिका। विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये का 95 के पार जाना अब एक सामान्य बात हो सकती है। वित्त मंत्रालय के अधिकारी इस दोहरी मार से चिंतित हैं। डॉलर महंगा होने और तेल की कीमतें बढ़ने से देश का राजकोषीय गणित पूरी तरह बिगड़ सकता है।

तेल कंपनियों पर बढ़ता अंडर-रिकवरी का भारी बोझ

सरकारी तेल कंपनियों के लिए अब पेट्रोल और डीजल की मौजूदा कीमतों को बरकरार रखना नामुमकिन नजर आ रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों को पेट्रोल पर 24 रुपये और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का घाटा (अंडर-रिकवरी) हो रहा है। चुनाव खत्म होने के बाद अब कंपनियां धीरे-धीरे खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी का फैसला कर सकती हैं। तेल के आयात बिल में हो रही भारी वृद्धि इसकी सबसे बड़ी वजह बनी है।

बाजार में अस्थिरता के तीन सबसे प्रमुख कारण

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के विशेषज्ञों ने इस संकट के पीछे तीन बड़े कारण बताए हैं। पहला, ब्रेंट क्रूड का 126 डॉलर तक पहुंचना, जिससे व्यापार घाटा बढ़ेगा। दूसरा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालना। तीसरा, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़कर 4.4 प्रतिशत होना है। इन वजहों से भारतीय शेयर बाजार पर भी दबाव बढ़ रहा है। विदेशी निवेशकों की निकासी से बाजार में डॉलर की कमी हो रही है और रुपया कमजोर पड़ रहा है।

आयात बिल में अरबों रुपये की भारी बढ़ोतरी

कच्चे तेल की कीमत में महज एक डॉलर की वृद्धि भारत के आयात बिल को 8,000 करोड़ रुपये बढ़ा देती है। युद्ध की शुरुआत में क्रूड 72 डॉलर पर था, जो अब लगभग दोगुना हो चुका है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। आपूर्ति बाधित होने और होर्मुज जलडमरूमध्य में टैंकर फंसने से संकट और गहरा गया है। अप्रैल 2026 में भारत की औसत खरीद कीमत 114.25 डॉलर प्रति बैरल रही है।

आम आदमी पर बढ़ेगा महंगाई का दोहरा वार

महंगा कच्चा तेल और कमजोर रुपया देश में महंगाई को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि से माल ढुलाई महंगी होगी, जिसका असर सब्जियों और अन्य जरूरी वस्तुओं के दामों पर पड़ेगा। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर स्थिर रहती हैं, तो भारत का चालू खाते का घाटा (CAD) बेलगाम हो सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया के युद्धविराम प्रयासों पर टिकी हुई हैं।

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