ईएसआईसी अस्पताल की बेरहमी ने ली दो मासूम जिंदगियां, क्या 50 लाख के मुआवजे से लौटेंगे अपनों के प्राण?

Faridabad News: कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) अस्पताल में समय पर इलाज न मिलने के कारण हुई मौतों का मामला अब लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। डॉक्टरों की घोर लापरवाही और अस्पताल प्रबंधन के अड़ियल रवैये से नाराज मृतकों के परिजनों ने अब इंसाफ के लिए कानूनी लड़ाई शुरू कर दी है।

अस्पताल की इस बदहाली को लेकर स्थानीय निवासियों और कई सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। समय पर उचित चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण दो अलग-अलग मामलों में मरीजों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पीड़ित परिवारों ने अब प्रशासन से लापरवाह डॉक्टरों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

कूल्हे का ऑपरेशन टाला, तड़प-तड़प कर तोड़ दिया दम

गाजीपुर गांव के रहने वाले श्याम बिहारी गिरि घर में गिरने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अस्पताल के डॉक्टरों ने सामान की कमी का बहाना बनाकर उनके कूल्हे का जरूरी ऑपरेशन कई दिनों तक टाले रखा। जब तक डॉक्टरों ने उनका ऑपरेशन किया, तब तक उनकी शारीरिक स्थिति बेहद नाजुक हो चुकी थी।

ऑपरेशन के बाद इलाज में हुई अत्यधिक देरी के कारण श्याम बिहारी गिरि की दर्दनाक मौत हो गई। इस घटना से आक्रोशित परिजनों ने वकील के माध्यम से ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल प्रशासन को कानूनी नोटिस भेजा है। पीड़ित परिवार ने मामले की उच्च स्तरीय जांच और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की है।

अस्पतालों के चक्कर काटती रही पांच महीने की मासूम

लापरवाही का दूसरा दिल दहला देने वाला मामला पर्वतीय कॉलोनी के रहने वाले जितेंद्र यादव की पांच महीने की बेटी से जुड़ा है। बच्ची की तबीयत खराब होने पर माता-पिता उसे ईएसआईसी अस्पताल लेकर पहुंचे थे। डॉक्टरों ने बच्ची को गंभीर हालत में देखने के बाद भी भर्ती करने के बजाय नागरिक अस्पताल रेफर कर दिया।

नागरिक अस्पताल में भी जब मासूम को इलाज नहीं मिला, तो डॉक्टरों ने उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाने की सलाह दी। दिल्ली ले जाते समय रास्ते में ही पांच महीने की मासूम बच्ची ने दम तोड़ दिया। इस दर्दनाक मामले की शिकायत अब हरियाणा मानव अधिकार आयोग में दर्ज कराई गई है।

चार फीसदी अंशदान के बाद भी नहीं मिल रहा इलाज

वासी-प्रवासी कल्याण एसोसिएशन के अध्यक्ष संतोष यादव ने अस्पताल के इस बिगड़े हुए सिस्टम पर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने कहा कि जिन गरीब श्रमिकों का मासिक वेतन 21 हजार रुपये से कम है, उनके वेतन से हर महीने कुल चार प्रतिशत का अंशदान ईएसआईसी के खाते में जमा किया जाता है।

श्रमिकों का पैसा जमा होने के बावजूद उन्हें डिस्पेंसरी और अस्पतालों में इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। दूसरी तरफ, ईएसआईसी अस्पताल प्रशासन का कहना है कि उन्हें शिकायतें और नोटिस मिल चुके हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच कमेटी का गठन कर दिया गया है।

Author: Sandeep Hooda

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