Uttar Pradesh News: इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक सख्त टिप्पणी के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस की शक्तियों में बड़ा बदलाव हुआ है। अब राज्य के किसी भी थाने में घरेलू हिंसा और बालश्रम समेत 29 गंभीर कानूनों के तहत सीधे मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकेगा। इन मामलों में अब पीड़ितों को न्याय के लिए सीधे कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा।
हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने तुरंत एक नया आदेश जारी कर दिया है। पुलिस मुख्यालय ने कुल 31 ऐसे कानूनों की सूची थानों को भेजी है, जिनमें सीधे अदालत में परिवाद यानी कंप्लेंट केस दर्ज कराने का कानूनी प्रावधान है। इस नए नियम से पुलिसिया कार्रवाई का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा।
इन दो बड़े कानूनों में पुलिस को मिली विशेष छूट
डीजीपी मुख्यालय की इस नई गाइडलाइन में दो महत्वपूर्ण कानूनों को अपवाद के तौर पर शामिल किया गया है। इनमें दहेज निषेध अधिनियम 1961 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 शामिल हैं। इन दोनों मामलों में कोर्ट में परिवाद का नियम होने के बावजूद पुलिस पहले की तरह सीधे प्राथमिकी दर्ज कर सकती है।
नए नियमों के तहत अब चेक बाउंस, ट्रेडमार्क उल्लंघन, पर्यावरण प्रदूषण और पीसीपीएनडीटी एक्ट जैसे मामलों में सीधी एफआईआर पर रोक लग गई है। इसके साथ ही खाद्य मिलावट, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न यानी पोश एक्ट से जुड़े मामलों में भी पीड़ित को पहले सीधे मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा।
जानिए हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश की पूरी वजह
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले दिनों अनुराधा तिवारी मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी थी। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि वैवाहिक विवादों और मानहानि जैसे अपराधों में केवल अदालत में दाखिल परिवाद के आधार पर ही कानूनी संज्ञान लिया जा सकता है। पुलिस इनमें सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
इस अदालती निर्देश के बाद पुलिस महानिदेशक अभियोजन ने एक विशेष टीम बनाकर नियमों की समीक्षा की थी। जांच के बाद 31 ऐसे अधिनियमों की सूची तैयार हुई जिनमें परिवाद जरूरी है। इसके उलट 39 ऐसे कानूनों की अलग सूची बनाई गई जिनमें पुलिस को सीधे एफआईआर दर्ज करने का पूरा अधिकार दिया गया है।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनुराग आर्य ने बताया कि शासन और हाईकोर्ट के इस आदेश का जिलों में कड़ाई से पालन शुरू हो गया है। सभी थाना प्रभारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रतिबंधित 29 अधिनियमों के तहत सीधे मुकदमा न लिखें। ऐसा करने से अदालतों में लंबित मुकदमों का बोझ भी कम होने की उम्मीद है।
Author: Ajay Mishra

