मोरारजी देसाई: भारत रत्न और निशान-ए-पाकिस्तान पाने वाले इकलौते शख्स, जो बने पहले गैर-कांग्रेसी पीएम

India News: मोरारजी देसाई भारतीय इतिहास के एकमात्र ऐसे शख्स हैं, जिन्हें भारत रत्न और पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ दोनों से नवाजा गया। वह देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। उन्होंने 1977 से 1979 तक इस पद पर कार्य किया। 99 वर्ष की आयु में 10 अप्रैल 1995 को उनका निधन हुआ।

आपातकाल के बाद बने प्रधानमंत्री

मोरारजीदेसाई शुरुआत में कांग्रेस में थे, लेकिन बाद में अलग हो गए। उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोला। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की, जिसमें देसाई और जयप्रकाश नारायण सहित कई विपक्षी नेता जेल में डाल दिए गए। आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर अंकुश लगा दिया गया। मार्च 1977 में नए चुनाव हुए और आपातकाल समाप्त हुआ।

1977 के चुनाव में कांग्रेस को हार

1977 केचुनाव में 41.32 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जनता पार्टी ने भारी जीत हासिल की। उसने 295 सीटों पर कब्जा किया। कांग्रेस को महज 154 सीटें मिलीं। 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। यह आजादी के बाद पहली बार था जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई।

स्वतंत्रता संग्राम से लेकर राजनीति तक

मोरारजीदेसाई ने महात्मा गांधी के साथ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई। 1930 से 1940 के बीच वह करीब 10 साल ब्रिटिश जेल में रहे। उन्होंने 1930 में ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1931 में वह गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव बने। सरदार पटेल के निर्देश पर उन्होंने अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की शाखा स्थापित की। 1952 में वह बंबई के मुख्यमंत्री बने। 1967 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर वह उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बनाए गए।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

मोरारजीदेसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को गुजरात के भदेली गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता रणछोड़जी देसाई भावनगर में स्कूल अध्यापक थे, लेकिन उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। पिता की मृत्यु के तीसरे दिन मोरारजी की शादी हुई। उन्होंने बंबई से पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक के भाषण सुने। राजनीति में आने से पहले वह सिविल सर्विस में जाना चाहते थे। मई 1918 में वह अहमदाबाद के उप जिलाधीश बने, लेकिन 1930 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

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