केरल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 40 साल बाद शहीद जवान की विधवा को मिलेगी विकलांगता पेंशन

Kerala News: केरल हाई कोर्ट ने सिजोफ्रेनिया के कारण सेना से सेवामुक्त किए गए जवान की विधवा को बड़ी राहत दी है। अदालत ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुरक्षा कानूनों की व्याख्या हमेशा पीड़ित पक्ष के हित में होनी चाहिए।

जस्टिस के नटराजन और जॉनसन जॉन की खंडपीठ ने 26 मई को सुनवाई के दौरान कहा कि विकलांगता पेंशन जैसी योजनाएं लाभकारी प्रकृति की होती हैं। इसलिए इनके प्रावधानों की व्याख्या उदार तरीके से की जानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि संदेह की स्थिति में फैसला उस पक्ष के हित में होना चाहिए जिसे लाभ मिलना है।

सिजोफ्रेनिया को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जवान ने बीमारी के कारण स्वेच्छा से सेना नहीं छोड़ी थी। मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर उन्हें सेवा के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। ऐसे मामलों में विकलांगता पेंशन रोकने का आधार साबित करने की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित प्राधिकरण पर ही होती है।

कोर्ट ने सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा विनियम 1983 के नियम 423(C) का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया है कि भर्ती के समय यदि किसी बीमारी का उल्लेख नहीं हुआ हो तो सामान्यतः उसे सेवा के दौरान उत्पन्न बीमारी माना जाएगा। केवल ठोस चिकित्सकीय कारण होने पर ही इसे जन्मजात माना जा सकता है।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर उठे सवाल

हाई कोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने यह साबित करने के लिए कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया कि जवान की सिजोफ्रेनिया जन्मजात थी। अदालत ने माना कि केवल अनुमान के आधार पर विकलांगता पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का आदेश सही माना गया।

मामले के अनुसार, जवान अगस्त 1973 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1979 में सिजोफ्रेनिया की वजह से उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया गया। बाद में 1994 में उनका निधन हो गया। विकलांगता पेंशन के लिए किए गए दावे को पहले खारिज कर दिया गया था।

चार दशक तक चली विधवा की कानूनी लड़ाई

जवान की पत्नी ने पेंशन के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। रक्षा मंत्रालय में की गई अपील भी खारिज हो गई थी। इसके बाद मामला सशस्त्र बल न्यायाधिकरण पहुंचा। न्यायाधिकरण ने कहा कि मेडिकल बोर्ड का निष्कर्ष तर्कसंगत नहीं था और जवान दो वर्षों के लिए 60 प्रतिशत विकलांगता पेंशन पाने के हकदार थे।

इस फैसले के दौरान अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के पुराने निर्णय का भी उल्लेख किया। उस फैसले में कहा गया था कि विकलांगता के कारण सेवा से हटाए गए सैन्यकर्मी न्यूनतम 15 वर्ष की सेवा पूरी न करने पर भी विकलांगता पेंशन के अधिकारी होंगे।

एसआईआर प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को यह प्रक्रिया चलाने का अधिकार है। कोर्ट ने माना कि प्रक्रिया में कोई कानूनी खामी नहीं है और यह संविधान के अनुरूप है।

Author: Adv Anuradha Rajput

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