Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसके जरिए लाहौल-स्पीति और चंबा के आदिवासी इलाकों की पंचायतों को समय से पहले भंग किया गया था। कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद सभी मौजूदा चुने हुए प्रतिनिधि अगले आदेश तक अपने पदों पर बने रहेंगे।
मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी नेगी की खंडपीठ ने सरकार के 24 जून के नोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अपना संवैधानिक कार्यकाल पूरा करने का पूरा हक है और सरकार इसे बीच में नहीं छीन सकती है।
क्यों शुरू हुआ कार्यकाल का यह कानूनी विवाद
यह पूरा कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मई 2026 में हुए नए चुनावों के बाद शुरू हुआ। इन आदिवासी क्षेत्रों के मौजूदा जनप्रतिनिधियों का पांच साल का कार्यकाल अक्टूबर 2026 में खत्म होना था। सरकार ने नए और पुराने जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल के टकराव को टालने के लिए यह कदम उठाया था।
राज्य सरकार ने पंचायती राज कानून में संशोधन करके मौजूदा पंचायतों को तुरंत प्रभाव से भंग कर दिया था। इसके साथ ही नवनिर्वाचित सदस्यों की पहली बैठक भी तय समय से पहले बुला ली गई थी। सरकार के इसी फैसले के खिलाफ मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी थी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें और फैसला
याचिकाकर्ताओं के वकील विनय शर्मा ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 243ई पंचायतों को पांच साल की गारंटी देता है। किसी भी नए विधायी संशोधन को पुराने प्रतिनिधियों पर पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ सरकारी वकील ने कानून में नए संशोधन का हवाला देते हुए फैसले का बचाव किया।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद माना कि सरकार की कार्रवाई से जनप्रतिनिधियों के अधिकारों का हनन हुआ है। इस मामले में व्यापक जनहित शामिल है, इसलिए सरकारी अधिसूचना के अमल पर रोक लगाई जाती है। इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई अब आगामी 12 अगस्त 2026 को होगी।

