World News: आर्थिक कंगाली, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और अभूतपूर्व सुरक्षा संकट से जूझ रहा पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन भू-राजनीतिक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक मामलों के बड़े जानकारों के अनुसार, पाकिस्तान एक तरफ जहां गहरे विदेशी कर्ज के जाल में डूबा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ वह दो धुर विरोधी महाशक्तियों चीन और अमेरिका के बीच संतुलन साधने की बेहद खतरनाक कसरत कर रहा है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इस्लामाबाद के रणनीतिक गलियारों में अब यह बड़ा सवाल गूंज रहा है कि क्या देश की इस चरमराती आंतरिक अव्यवस्था के बीच पाकिस्तान अपनी इस ‘बैलेंसिंग एक्ट’ यानी संतुलन नीति को लंबे समय तक बरकरार रख पाएगा? अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंकों का मानना है कि जैसे-जैसे वाशिंगटन और बीजिंग के बीच वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, पाकिस्तान के लिए दोनों नावों पर एक साथ सवारी करना लगभग असंभव होता जा रहा है।
विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान की पूरी अर्थव्यवस्था इस समय वेंटिलेटर या ‘लाइफ सपोर्ट’ पर चल रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मिलने वाले बेलआउट पैकेज और मित्र देशों, विशेषकर चीन, सऊदी अरब और यूएई से मिलने वाले रोलओवर कर्ज के सहारे ही यह देश डिफ़ॉल्ट होने से किसी तरह बच रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस भारी-भरकम विदेशी कर्ज ने पाकिस्तान की विदेश नीति की स्वतंत्रता को पूरी तरह सीमित कर दिया है।
चीन बनाम अमेरिका के दो पाटों के बीच पिसा इस्लामाबाद
पाकिस्तान के सामने इस समय सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते शीत युद्ध में किसी एक का पक्ष लेने से बचना है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत अरबों डॉलर के निवेश के कारण इस्लामाबाद पूरी तरह बीजिंग पर निर्भर हो चुका है। बीजिंग का यह कर्ज और उसका राजनीतिक समर्थन पाकिस्तान की मौजूदा हुकूमत को बचाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
दूसरी ओर, वाशिंगटन के साथ संबंध सुधारना भी पाकिस्तान की बहुत बड़ी मजबूरी है। आईएमएफ में अपनी वित्तीय बात मनवाने, वैश्विक वित्तीय मोर्चों पर राहत पाने और अपने सैन्य आधुनिकीकरण के लिए उसे अमेरिका के वीटो और मजबूत वैश्विक समर्थन की हर हाल में दरकार रहती है। ऐसे में दोनों देशों को एक साथ खुश रखना अब पाकिस्तान के वश से बाहर होता नजर आ रहा है।
अपनी लगातार गिरती वैश्विक साख को बचाने के लिए पाकिस्तान खुद को एक ‘मध्यस्थ’ के रूप में पेश करने की नाकाम कोशिश कर रहा है। चाहे वह पश्चिम एशिया का बड़ा संकट हो या अमेरिका और क्षेत्रीय ताकतों के बीच कोई अहम संवाद, इस्लामाबाद अपनी रणनीतिक स्थिति का फायदा उठाकर खुद को प्रासंगिक बनाए रखना चाहता है। हालांकि, आंतरिक रूप से बेहद कमजोर इस देश की मध्यस्थता पर अब कोई भी वैश्विक शक्ति भरोसा नहीं कर रही है।
आंतरिक मोर्चे पर मची चौतरफा कलह और सुरक्षा संकट
पाकिस्तान इस समय आंतरिक रूप से भी पूरी तरह टूट चुका है। सरकार और विपक्ष के बीच जारी भीषण राजनीतिक खींचतान और शासन में सेना की अति-सक्रिय भूमिका ने देश में एक बड़ी अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसके अलावा, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में चीनी नागरिकों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर लगातार बढ़े आतंकी हमलों ने बीजिंग को पूरी तरह नाराज कर दिया है और देश की सुरक्षा की पोल खोल दी है।
Author: Pallavi Sharma

