हिमाचल प्रदेश: ऊपरी शिमला में शराब ठेकों की नीलामी अटकी, आबकारी विभाग विकल्प तलाशने में जुटा

Himachal Pradesh: शिमला जिले के ऊपरी क्षेत्रों में शराब के ठेकों की नीलामी प्रक्रिया पूरी तरह से रुक गई है। आबकारी विभाग को लगातार 12 दिनों से कोई नया ठेकेदार नहीं मिल पाया है। इस स्थिति ने राज्य सरकार और आबकारी विभाग की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। ठेकेदारों की इस बेरुखी के कारण सरकारी राजस्व को भारी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। विभाग अब इस गंभीर समस्या का समाधान निकालने के लिए विभिन्न विकल्पों पर तेजी से विचार कर रहा है।

प्रमुख क्षेत्रों में राजस्व का भारी नुकसान

ऊपरी शिमला के रामपुर, रोहड़ू, कुमारसैन और सुन्नी जैसे महत्वपूर्ण इलाके इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित हैं। ये सभी क्षेत्र हर साल राज्य सरकार को करोड़ों रुपये का आबकारी राजस्व प्रदान करते हैं। इन प्रमुख इलाकों में ठेकों का आवंटन न होना सरकार के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका है। विभाग को इन क्षेत्रों से हमेशा अच्छी खासी कमाई होती रही है। अब दुकानों के बंद रहने से दैनिक राजस्व का ग्राफ लगातार नीचे गिरता जा रहा है।

नई आबकारी नीति बनी मुख्य बाधा

इस समस्या की मुख्य वजह राज्य सरकार की नई आबकारी नीति को माना जा रहा है। सरकार ने इस वर्ष ठेकों के आवंटन के लिए पिछले साल के रेट को ही आधार मूल्य बनाया है। इसके साथ ही टेंडर प्रक्रिया में इस मूल्य पर अतिरिक्त बढ़ोतरी भी तय कर दी गई है। नई नीति के इन कड़े नियमों ने आवंटन प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। ठेकेदार इस नई व्यवस्था को अपने व्यापार के लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं मान रहे हैं।

ठेकेदारों को सता रहा भारी आर्थिक जोखिम

नीति में हुए इस बदलाव के कारण ठेकेदार टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लेने से बच रहे हैं। उनका मानना है कि बढ़ी हुई दरों पर ठेके लेना एक बहुत बड़ा आर्थिक जोखिम है। बाजार की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मुनाफे की गुंजाइश काफी कम हो गई है। इस वजह से कोई भी व्यापारी अपना पैसा फंसाने को तैयार नहीं है। लगातार बढ़ते बेस प्राइस ने शराब कारोबारियों को निवेश करने से पूरी तरह से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है।

प्रतिस्पर्धा की उम्मीदें पूरी तरह से टूटीं

आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को इस बार टेंडर प्रक्रिया में भारी प्रतिस्पर्धा की पूरी उम्मीद थी। लगातार प्रयासों और बैठकों के बावजूद अब तक कोई भी सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ सका है। विभाग की सारी उम्मीदें अब जमीनी वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत साबित हो रही हैं। अधिकारी लगातार ठेकेदारों से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं। फिर भी, ऊंचे दामों के कारण कोई भी पक्ष अभी तक समझौते के लिए आगे नहीं आया है, जिससे विभाग काफी निराश है।

सरकारी निगम को मिल सकती है जिम्मेदारी

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विभाग अब एक वैकल्पिक योजना पर काम कर रहा है। यदि आने वाले कुछ दिनों में निजी ठेकेदार नहीं मिलते हैं, तो जिम्मेदारी सरकारी निगम को दी जाएगी। सरकार इन शराब दुकानों का संचालन सीधे अपने नियंत्रण में लेने का विचार कर रही है। इससे पहले शिमला शहर में भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई थी। उस समय भी प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए यह कड़ा और अहम फैसला लिया था।

शिमला शहर के मॉडल को लागू करने की तैयारी

शिमला शहर में ठेकेदारों की कमी के कारण 12 दुकानों का संचालन सरकारी एजेंसी को सौंपा गया था। अब आबकारी विभाग उसी सफल मॉडल को ऊपरी शिमला के इलाकों में भी लागू करना चाहता है। इस व्यवस्था से सरकार को राजस्व का नुकसान होने से बचाया जा सकेगा। विभाग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि शराब की बिक्री सुचारू रूप से चलती रहे। सरकारी एजेंसी के माध्यम से संचालन करने पर शराब की गुणवत्ता और मूल्य दोनों पर नियंत्रण रहेगा।

अंतिम फैसले के लिए कुछ दिनों का इंतजार

आबकारी विभाग अभी कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले कुछ दिन और इंतजार कर रहा है। अधिकारियों की नजर आने वाले दिनों के घटनाक्रम और ठेकेदारों के संभावित रुख पर टिकी हुई है। यह तय किया जाएगा कि निजी क्षेत्र को एक और मौका दिया जाए या नहीं। यदि स्थिति में कोई सुधार नहीं होता है, तो सरकारी व्यवस्था के तहत दुकानों को चलाया जाएगा। विभाग हर हाल में राज्य के राजस्व हितों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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