Delhi News: देश की राजधानी दिल्ली में सोमवार को विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडी अलायंस’ की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में 25 विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं ने हिस्सा लिया। सभी नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने का बड़ा फैसला किया है। लेकिन इस बैठक के बीच एक बहुत बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो गया।
विपक्षी एकजुटता की बैठक के दौरान तृणमूल कांग्रेस में ऐतिहासिक फूट
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विशेष आग्रह पर यह महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य विपक्षी दलों को एक मंच पर लाना था। लेकिन जब ममता बनर्जी दिल्ली में कांग्रेस नेताओं के साथ मिलकर रणनीति बना रही थीं, ठीक उसी समय संसद में उनकी खुद की पार्टी बिखर गई।
तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बगावत कर दी है। इन सभी बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में लोकसभा स्पीकर को एक आधिकारिक पत्र सौंपा है। इस पत्र में सांसदों ने संसद के भीतर केंद्र सरकार यानी एनडीए को अपना खुला समर्थन देने का ऐलान किया है।
तीन धड़ों में बंटी ममता बनर्जी की पार्टी, बगावत पर दीदी मौन
इस बड़े राजनीतिक संकट के बाद तृणमूल कांग्रेस स्पष्ट रूप से तीन अलग-अलग गुटों में बंटी हुई नजर आ रही है। पहले गुट में खुद ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी शामिल हैं। दूसरा गुट लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार का है। वहीं तीसरा गुट बंगाल विधानसभा में पार्टी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी का है।
हैरानी की बात यह है कि ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी में हुई इस ऐतिहासिक टूट पर पूरी तरह मौन हैं। उन्होंने मीडिया के सामने इस मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं कहा है। राजनीति में समय कितनी तेजी से बदलता है, यह सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर साफ तौर पर दिखाई दे गया।
क्षेत्रीय क्षत्रपों की मजबूरी और कांग्रेस का बदलता राजनीतिक कद
इस समय विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है। वर्तमान में तीन राज्यों में कांग्रेस की मजबूत सरकारें चल रही हैं। हालांकि, कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर लगातार तीन लोकसभा चुनाव हार चुकी है। इसके बावजूद गठबंधन के भीतर अब राहुल गांधी और कांग्रेस का दबदबा काफी बढ़ गया है।
दूसरी तरफ, चुनाव हार चुके क्षेत्रीय नेता जैसे अखिलेश यादव, शरद पवार, उद्धव ठाकरे और तेजस्वी यादव इस समय बेहद कमजोर स्थिति में हैं। अरविंद केजरीवाल और एमके स्टालिन जैसे नेता भी चुनाव हारने के बाद धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य मंच से दूर होते चले गए। इसी वजह से यह गठबंधन बिखरने लगा था।
गद्दार और वफादार की बहस के बीच उलझी बंगाल की राजनीति
तृणमूल कांग्रेस का साथ छोड़ने वाले नेताओं में काकोली घोष दस्तीदार जैसे वरिष्ठ नाम शामिल हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी पार्टी में बिताया है। इसलिए पार्टी के वफादार नेता अब इन बागी सांसदों के पाला बदलने को सीधे तौर पर बड़ी गद्दारी कह रहे हैं। इससे बंगाल की राजनीति गरमा गई है।
दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस छोड़ने वालों को गद्दार कहने वाले नेता खुद कभी दूसरी पार्टी में थे। कीर्ति आजाद लंबे समय तक बीजेपी में रहे और चुनाव से ठीक पहले उन्होंने ममता बनर्जी की शरण ली थी। अब वही कीर्ति आजाद बरसों पुराने नेताओं को गद्दार बता रहे हैं।
Author: Harikarishan Sharma


