Lucknow News: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कैसरबाग स्थित सिविल कोर्ट परिसर के आसपास से अवैध कब्जे हटाने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने न्यायिक कार्य बाधित करने और अधिवक्ताओं के बीच लाठियां बांटने के वीडियो पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस मामले में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
सोमवार को हुई करीब डेढ़ घंटे की सुनवाई के दौरान अदालत ने अधिवक्ताओं से सवाल किया कि क्या लाठियां बांटकर प्रशासन को उनके संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन से रोका जा सकता है। अदालत ने पिछले एक सप्ताह से न्यायिक कार्य प्रभावित होने पर चिंता व्यक्त की और कहा कि व्यवस्था को इस तरह से बंधक नहीं बनाया जा सकता।
अतिक्रमण और जनहित पर न्यायालय की प्राथमिकता
अधिवक्ताओं ने नगर निगम द्वारा अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए, जिस पर न्यायालय ने एंबुलेंस के फंसने और एक मरीज की दुखद मौत का हवाला देते हुए सफाई दी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सिविल कोर्ट परिसर के आसपास अतिक्रमण के कारण उत्पन्न होने वाली गंभीर समस्याओं को देखते हुए यह कार्रवाई अनिवार्य थी। साथ ही, क्षतिग्रस्त हुई दुकान के मामले में उचित मुआवजा और स्थान आवंटन की प्रक्रिया का भी आश्वासन दिया।
सुनवाई के दौरान एक सकारात्मक कदम की जानकारी देते हुए अदालत ने बताया कि कैसरबाग स्थित पुरानी तहसील की भूमि को वकीलों के चैंबर के लिए आवंटित करने की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। बार एसोसिएशनों को इस संबंध में पहले ही सूचित किया जा चुका है। इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत न्यायिक आदेश जल्द ही जारी किया जाएगा।
न्यायालय ने यह साफ कर दिया है कि न्यायिक कामकाज की गरिमा और आम जनता की सुरक्षा सर्वोपरि है। किसी भी प्रकार का प्रदर्शन या बाधा जो न्याय प्रक्रिया में व्यवधान डालती है, उसे गंभीरता से लिया जाएगा। वकीलों और प्रशासन के बीच जारी इस गतिरोध पर हाई कोर्ट की यह टिप्पणी कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
Author: Ajay Mishra

