India News: देश के करोड़ों गिग वर्कर्स ने ईंधन की बढ़ती कीमतों और कम मेहनताने के खिलाफ आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। ‘गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन’ (GIPSU) के आह्वान पर कल यानी 16 मई को दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक देशव्यापी हड़ताल रहेगी। इस दौरान जोमैटो, स्विगी, ओला और उबर जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के लाखों डिलीवरी पार्टनर्स और कैब ड्राइवर्स अपना ऐप लॉग-ऑफ रखेंगे। इस बड़े आंदोलन से देश के महानगरों में ऑनलाइन फूड डिलीवरी और कैब सेवाएं पूरी तरह ठप रह सकती हैं।
हड़ताल का मुख्य कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी है। यूनियन का कहना है कि वैश्विक बाजार में ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का बोझ सीधे तौर पर इन कामगारों पर डाल दिया गया है। डिलीवरी पार्टनर्स को हर दिन औसतन 50 से 70 किलोमीटर वाहन चलाना पड़ता है। ईंधन महंगा होने और कंपनियों द्वारा भुगतान न बढ़ाने से उनकी रोज की बचत खत्म हो गई है। कई कामगार अब कर्ज के जाल में फंस रहे हैं।
न्यूनतम दर और सुरक्षा की मांग
यूनियन ने सरकार और टेक कंपनियों के सामने अपनी मांगों की लंबी सूची रखी है। उनकी सबसे प्रमुख मांग है कि न्यूनतम सेवा दर ₹20 प्रति किलोमीटर तय की जाए। इसके साथ ही ईंधन की कीमतें बढ़ने पर ऑटोमैटिक पेमेंट एडजस्टमेंट की प्रणाली लागू करने की भी मांग की गई है। कामगारों का कहना है कि वे भीषण गर्मी में 12-14 घंटे काम करते हैं। उन्हें न तो स्वास्थ्य बीमा मिलता है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा या पेंशन का लाभ दिया जाता है।
राष्ट्रीय समन्वयक निर्मल गोराना के मुताबिक, भारत में 1.2 करोड़ से ज्यादा गिग वर्कर्स पूरी तरह से ऐप-आधारित कंपनियों पर निर्भर हैं। टेक कंपनियां अरबों डॉलर की वैल्यूएशन पर काम कर रही हैं, लेकिन उनके सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ ‘पार्टनर्स’ आर्थिक बोझ तले दबे जा रहे हैं। यूनियन ने चेतावनी दी है कि ऐप कंपनियों द्वारा की जाने वाली मनमानी पेनाल्टी और बिना कारण आईडी डी-एक्टिवेशन पर तुरंत रोक लगाई जाए। सरकार को इनके लिए अलग लेबर कोड बनाना चाहिए।
महानगरों में दिखेगा सबसे बड़ा असर
शनिवार दोपहर के पीक ऑर्डर समय में होने वाली इस हड़ताल का असर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में सबसे ज्यादा दिखेगा। ब्लिंकिट और ज़ेप्टो जैसी क्विक कॉमर्स सेवाएं भी इस दौरान प्रभावित रहेंगी। यूनियन की अध्यक्ष सीमा सिंह ने स्पष्ट किया कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा। कामगार स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन कर लोगों को जागरूक करेंगे। यदि मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में यह आंदोलन अनिश्चितकालीन और अधिक संगठित रूप ले सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गिग इकोनॉमी में ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ के नाम पर कामगारों का शोषण हो रहा है। पेट्रोल ₹100 के पार होने से उनकी आय का बड़ा हिस्सा तेल में ही चला जाता है। कंपनियों के एल्गोरिदम में पारदर्शिता की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है। सरकार को हस्तक्षेप कर यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐप कंपनियां ईंधन की महंगाई का बोझ कामगारों पर न डालें। शनिवार की यह हड़ताल लाखों परिवारों की आजीविका बचाने की एक गंभीर कोशिश है।

