हिमाचल पंचायत चुनावों में बैलेट पेपर बना परेशानी, घंटों लाइन में खड़े मतदाताओं ने उठाई EVM की मांग

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव के दौरान बैलेट पेपर व्यवस्था ने हजारों मतदाताओं की मुश्किलें बढ़ा दीं। धीमी मतदान प्रक्रिया के कारण लोगों को तेज धूप में घंटों इंतजार करना पड़ा। कई बूथों पर खराब प्रिंटिंग, धुंधले चुनाव चिह्न और हाथ से लिखे नामों ने मतदान प्रक्रिया को और जटिल बना दिया।

प्रदेश में दो चरणों में हुए पंचायत चुनावों के दौरान मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें देखने को मिलीं। बैलेट पेपर पर मुहर लगाने की पुरानी व्यवस्था के कारण वोटिंग की रफ्तार बेहद धीमी रही। इसका सबसे ज्यादा असर बुजुर्ग, दिव्यांग और महिला मतदाताओं पर पड़ा, जिन्हें लंबे समय तक धूप में खड़ा रहना पड़ा।

हाथ से लिखे नामों ने बढ़ाई मतदाताओं की परेशानी

कई मतदान केंद्रों पर बैलेट पेपर में प्रत्याशियों के नाम हाथ से लिखे गए थे। कुछ जगह लिखावट साफ थी, लेकिन कई बूथों पर नाम इतने टेढ़े-मेढ़े लिखे गए कि मतदाताओं को पढ़ने में परेशानी हुई। कम पढ़े-लिखे और बुजुर्ग वोटरों को सही प्रत्याशी पहचानने में काफी समय लग गया।

मतदाताओं ने आरोप लगाया कि कई बैलेट पेपर हल्के कागज पर छापे गए थे। चुनाव चिह्न भी ब्लैक एंड व्हाइट और धुंधले दिखाई दिए। ऐसे में लोगों को अपने पसंदीदा उम्मीदवार का निशान ढूंढने में दिक्कत हुई। जिन सीटों पर 10 से 12 प्रत्याशी मैदान में थे, वहां स्थिति और ज्यादा खराब नजर आई।

धीमी मतदान प्रक्रिया पर लोगों में नाराजगी बढ़ी

मतदान के बाद कई लोगों ने खुलकर कहा कि पंचायत चुनाव अब ईवीएम मशीनों से कराए जाने चाहिए। उनका कहना है कि डिजिटल दौर में घंटों लाइन में खड़ा रहना लोगों को परेशान करता है। मतदाताओं का मानना है कि अगर व्यवस्था नहीं बदली गई तो भविष्य में मतदान प्रतिशत पर असर पड़ सकता है।

चुनाव ड्यूटी में तैनात कर्मचारियों ने भी बैलेट पेपर प्रणाली को चुनौतीपूर्ण बताया। एक वोटर को वार्ड पंच, प्रधान, उप-प्रधान, बीडीसी और जिला परिषद के लिए अलग-अलग पांच स्लिपों पर मतदान करना पड़ा। इससे मतदान प्रक्रिया लंबी हुई और पोलिंग पार्टियों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया।

वोटों की गिनती और नतीजों पर भी असर

विशेषज्ञों का मानना है कि बैलेट पेपर आधारित मतदान में वोट खराब होने की संभावना ज्यादा रहती है। कई बार मुहर सही जगह न लगने से वोट अमान्य घोषित हो जाते हैं। इससे हार और जीत के अंतर पर असर पड़ता है। कई केंद्रों पर दोबारा गिनती की जरूरत भी पड़ती है, जिससे नतीजों में देरी होती है।

भारत निर्वाचन आयोग पहले ही लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ईवीएम और वीवीपैट जैसी तकनीकों का उपयोग कर चुका है। ऐसे में पंचायत चुनावों में अब भी पारंपरिक व्यवस्था जारी रहने पर सवाल उठ रहे हैं। मतदाताओं का कहना है कि तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाकर मतदान प्रक्रिया को आसान और तेज बनाया जा सकता है।

Author: Sunita Gupta

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