1966 में इंदिरा गांधी ने क्यों लिया था रुपया गिराने का फैसला, 36.5% अवमूल्यन से मच गया था राजनीतिक तूफान

India News: भारतीय रुपये के इतिहास में 6 जून 1966 का दिन बेहद अहम माना जाता है। उस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने रुपये का 36.5 प्रतिशत अवमूल्यन किया था। इस फैसले के बाद एक डॉलर की कीमत 4.76 रुपये से बढ़कर 7.50 रुपये हो गई। आर्थिक संकट के बीच लिया गया यह निर्णय लंबे समय तक राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय बना रहा।

युद्ध और सूखे ने बढ़ाई आर्थिक मुश्किलें

1960 के दशक के मध्य में भारत गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था। 1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ। इन संघर्षों का असर सरकारी वित्त पर पड़ा। इसी दौरान भीषण सूखे ने खाद्यान्न उत्पादन को प्रभावित किया, जिससे देश को बड़े पैमाने पर गेहूं और चावल आयात करने पड़े।

विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था। वर्ष 1965 में भारत का आयात 2,194 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था, जबकि निर्यात केवल 1,264 करोड़ रुपये रहा। इससे व्यापार घाटा 930 करोड़ रुपये हो गया। उस समय यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक माना गया और सरकार पर आर्थिक सुधारों का दबाव बढ़ने लगा।

विश्व बैंक और अमेरिका का बढ़ा दबाव

अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत को खाद्य संकट और विदेशी मुद्रा की कमी का सामना करना पड़ रहा था। इसी बीच विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने अतिरिक्त सहायता के लिए आर्थिक सुधारों और रुपये के अवमूल्यन की शर्त रखी। सरकार के सामने आर्थिक स्थिरता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की बड़ी चुनौती थी।

अमेरिका ने उस समय खाद्यान्न सहायता और आर्थिक मदद देने की पेशकश की थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने भारत को लाखों टन गेहूं और चावल उपलब्ध कराया। साथ ही वित्तीय सहायता भी दी गई। हालांकि इस मदद को स्वीकार करना राजनीतिक रूप से आसान नहीं था और विपक्ष ने इसे बाहरी दबाव के आगे झुकना बताया।

कैसे बदली डॉलर और रुपये की तस्वीर

6 जून 1966 को घोषित अवमूल्यन के बाद भारतीय रुपये की कीमत में बड़ी गिरावट दर्ज हुई। डॉलर का मूल्य 4.76 रुपये से बढ़कर 7.50 रुपये हो गया। सरकार का मानना था कि इससे भारतीय निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा और विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद मिलेगी।

हालांकि इस फैसले का तत्काल विरोध शुरू हो गया। कांग्रेस के भीतर भी कई नेताओं ने इसे गलत कदम बताया। तत्कालीन वाणिज्य मंत्री मनुभाई शाह ने खुलकर विरोध किया। उनका तर्क था कि केवल रुपये को कमजोर करने से निर्यात में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होगी और व्यापारिक लाभ सीमित रहेगा।

क्या अवमूल्यन से मिला आर्थिक फायदा

कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती आलोचनाओं के बावजूद इस फैसले का मध्यम अवधि में सकारात्मक असर दिखाई दिया। अवमूल्यन के बाद निर्यात की गति बढ़ी और आयात में कमी आई। अगले कुछ वर्षों में व्यापार घाटा पहले की तुलना में काफी घट गया, जिससे भुगतान संतुलन में सुधार देखने को मिला।

आर्थिक विश्लेषकों ने बाद में 1991 के आर्थिक संकट का उदाहरण भी दिया। उस दौर में भी रुपये का मूल्य तेजी से गिरा था, लेकिन इसके बाद निर्यात बढ़ा और व्यापार घाटे में कमी आई। इसी कारण कई विशेषज्ञ मानते हैं कि हर परिस्थिति में कमजोर मुद्रा अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक नहीं होती।

सोवियत संघ की नाराजगी भी आई सामने

रुपये के अवमूल्यन का असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ा। उस समय भारत को सोवियत संघ का करीबी माना जाता था। सोवियत नेतृत्व ने इस फैसले पर असंतोष जताया और इसे पश्चिमी देशों की ओर झुकाव के संकेत के रूप में देखा। हालांकि बाद में उसने भारत को सैन्य और आर्थिक सहयोग देना जारी रखा।

दूसरी ओर, अमेरिका और विश्व बैंक भी कुछ समय बाद परिणामों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखे। उनका मानना था कि भारत ने अपेक्षित आर्थिक उदारीकरण को पूरी तरह लागू नहीं किया। इसके बावजूद 1966 का यह फैसला भारतीय आर्थिक इतिहास के सबसे चर्चित और बहस वाले निर्णयों में शामिल हो गया।

Author: Rajesh Kumar

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