Saket Court का बड़ा फैसला: क्या सिर्फ बेरोजगार होने का बहाना बनाकर पत्नी-बच्चे को बेसहारा छोड़ सकता है पति?

Delhi News: दिल्ली की साकेत कोर्ट ने पारिवारिक विवाद मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी पति केवल बेरोजगार होने का दावा करके अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। वह अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की कानूनी जवाबदेही से बिल्कुल बच नहीं सकता है।

घरेलू हिंसा अपील पर एडिशनल सेशन कोर्ट का सख्त रुख

एडिशनल सेशन जज शीतला चौधरी प्रधान ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दायर एक विशेष अपील पर सुनवाई की। उन्होंने कहा कि पति की यह दलील कतई स्वीकार नहीं की जा सकती कि वह बेरोजगार है या उस पर दूसरे पारिवारिक दायित्व हैं। कोर्ट ने पति को बेटे के लिए हर महीने 6 हजार रुपए गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया।

कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों से बचने के लिए बेरोजगारी कोई ढाल नहीं

अदालत ने अपने कड़े फैसले में साफ कहा कि पति को अपने निजी खर्चों का प्रबंधन खुद करना होगा। केवल आर्थिक तंगी या दूसरी पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देकर कोई भी पुरुष अपनी विवाहित पत्नी और नाबालिग बेटे के प्रति कर्तव्यों से मुक्त नहीं हो सकता। इस मामले में कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के पुराने आदेश में जरूरी संशोधन किया है।

शादी के बाद दहेज के लिए प्रताड़ना और ससुराल से निकालने का आरोप

साकेत कोर्ट में दाखिल मुख्य याचिका के मुताबिक महिला ने गंभीर आरोप लगाए थे। महिला का विवाह फरवरी 2013 में हुआ था। इसके बाद उसे दहेज के लिए लगातार प्रताड़ित किया गया। उसके साथ मारपीट की गई और मानसिक रूप से परेशान किया गया। प्रेग्नेंसी के दौरान ही उसे ससुराल से जबरन निकाल दिया गया था।

साल 2015 से अलग रह रही पत्नी और बच्चे को नहीं मिली मदद

पीड़ित महिला साल 2015 से अपने मासूम बेटे के साथ बिल्कुल अलग रह रही है। रिकॉर्ड के मुताबिक 2015 में फैमिली कोर्ट में एक समझौता हुआ था। इसके बाद दोनों कुछ वक्त के लिए साथ रहे, लेकिन विवाद के कारण दोबारा अलग हो गए। पति ने तब से बच्चे के पालन-पोषण में कोई सहयोग नहीं दिया।

ट्रायल कोर्ट के फैसले को सेशन कोर्ट ने बदला और जताई नाराजगी

ट्रायल कोर्ट ने सितंबर 2025 में महिला की घरेलू हिंसा संबंधी शिकायत को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था। कोर्ट ने तब कहा था कि महिला शारीरिक हिंसा और आर्थिक उत्पीड़न के आरोप साबित नहीं कर सकी। हालांकि, सेशन कोर्ट ने पाया कि पिता ने लंबे समय से बेटे के लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं भेजी थी।

नाबालिग बच्चे की परवरिश के लिए माता और पिता दोनों बराबर जिम्मेदार

उच्च न्यायालय के निर्देशों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता की भी उतनी ही है जितनी मां की होती है। सुनवाई के दौरान पति ने अजीब दलील दी कि उसकी पत्नी पढ़ी-लिखी है। इसलिए वह स्वयं अपना और बच्चे का पूरा खर्च आसानी से उठा सकती है।

कमाने की क्षमता और वास्तविक आय में होता है बड़ा अंतर

इस दलील पर जज ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कमाने की क्षमता होना और वास्तविक आय अर्जित करना दो अलग बातें हैं। पति यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि पत्नी कोई काम कर रही है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति ने बार-बार मौका मिलने पर भी अपनी इनकम का एफिडेविट जमा नहीं किया।

साकेत सेशन कोर्ट ने ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए पति को आदेश दिया कि वह आदेश की तारीख से अपने बेटे के बालिग होने तक हर महीने नियमित रूप से 6,000 रुपए गुजारा भत्ता अदा करे। कोर्ट ने साफ कर दिया कि कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों से बचने के लिए बेरोजगारी को ढाल नहीं बनाया जा सकता है।

Author: Gaurav Malhotra

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