Delhi News: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं. छात्रों की गंभीर शिकायतों और टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के बाद शिक्षा मंत्रालय ने बड़ी कार्रवाई की है. मंत्रालय ने बोर्ड से विस्तृत रिपोर्ट मांगते हुए उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी है.
इस बड़े विवाद के केंद्र में हैदराबाद की एक गुमनाम सी कंपनी ‘Coempt’ आ गई है. इस छोटी कंपनी ने देश की सबसे बड़ी आईटी दिग्गज टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) को पछाड़ दिया था. कंपनी ने सीबीएसई का सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल मूल्यांकन पोर्टल का बड़ा कॉन्ट्रैक्ट अपने नाम कर लिया था.
टीसीएस जैसी दिग्गज कंपनी को कैसे मिली मात
सीबीएसई ने इस साल पहली बार कॉपियों को स्कैन करके ऑनलाइन जांचने की व्यवस्था की थी. इस महा-टेंडर को हासिल करने के लिए तकनीकी दौर में कड़ा मुकाबला हुआ था. पहले राउंड में Coempt कंपनी को 91 अंक मिले, जबकि टीसीएस को 89 अंक ही मिल सके थे.
इस मामूली अंतर के बाद सबसे बड़ा उलटफेर सब्जेक्टिव आंसर बुक इवैल्यूएशन कैटेगरी में हुआ. इस महत्वपूर्ण वर्ग में छोटी कंपनी को पूरे अंक मिल गए. इसके विपरीत लाखों करोड़ रुपये का टर्नओवर रखने वाली और 5.8 लाख कर्मचारियों वाली टीसीएस को इस कैटेगरी में शून्य अंक मिले.
रेट के खेल में आया 566 करोड़ का अंतर
इस टेंडर प्रक्रिया में कॉपियों के मूल्यांकन की दर सबसे बड़ा गेम चेंजर साबित हुई. Coempt ने प्रति कॉपी जांचने के लिए महज 25 रुपये की मांग रखी थी. दूसरी तरफ अनुभवी टीसीएस ने इसके लिए 53 रुपये से लेकर 65 रुपये तक की ऊंची कीमत कोट की थी.
इस भारी अंतर के कारण Coempt का कुल खर्च 384.6 करोड़ रुपये आ रहा था. वहीं टीसीएस के साथ यही काम कराने पर करीब 951.3 करोड़ रुपये का खर्च बैठता. दोनों कंपनियों के बीच सीधे 566 करोड़ रुपये का वित्तीय अंतर था, जो छोटी कंपनी के पक्ष में गया.
क्या होता है क्यूसीबीएस सिलेक्शन मॉडल
सीबीएसई ने इस डिजिटल प्रक्रिया के लिए क्वालिटी एंड कॉस्ट बेस्ड सिलेक्शन (QCBS) मॉडल का प्रयोग किया था. इस विशेष नियम के तहत 70 फीसदी महत्व तकनीकी योग्यता को मिलता है. इसके साथ ही बाकी 30 फीसदी महत्व काम की तय कीमत को दिया जाता है.
ऐसे मॉडल में यदि किसी कंपनी का तकनीकी स्कोर थोड़ा भी बेहतर हो, तो वह कम कीमत के दम पर अंतिम रैंकिंग में आसानी से बाजी मार लेती है. यही वजह थी कि टीसीएस जैसी प्रतिष्ठित कंपनी इस बड़े सरकारी ठेके की रेस से पूरी तरह बाहर हो गई थी.
सिर्फ 74 दिन पहले लागू हुआ नया सिस्टम
यह पूरा विवाद तब बढ़ा जब बोर्ड परीक्षा शुरू होने से महज 74 दिन पहले 5 दिसंबर को इस नई कंपनी को ठेका दिया गया. इतनी बड़ी परीक्षा के लिए पर्याप्त समय और तैयारी नहीं मिल सकी. इसके बाद रिजल्ट आते ही री-इवैल्यूएशन पोर्टल पूरी तरह क्रैश हो गया.
पोर्टल न खुलने से परेशान छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं. हालांकि सीबीएसई का कहना है कि टेंडर पूरी पारदर्शिता से हुआ था. शिक्षा मंत्रालय अब साइबर सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए फाइलों की बारीकी से जांच कर रहा है.
Author: Gaurav Malhotra


