Ranchi News: झारखंड में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों के त्वरित निपटारे को लेकर पुलिस मुख्यालय ने बेहद कड़ा रुख अपना लिया है। मुख्यालय ने राज्य के सभी जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (SSP) और पुलिस अधीक्षकों (SP) को एक विशेष गाइडलाइन जारी की है।
इस नई गाइडलाइन के तहत सभी पुलिस कप्तानों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने जिलों में लंबित चल रहे मामलों का प्राथमिकता के आधार पर तुरंत निष्पादन सुनिश्चित करें। पुलिस मुख्यालय के इस कड़े कदम से सालों से न्याय की आस लगाए बैठे पीड़ितों में एक नई उम्मीद जगी है।
मुख्यालय द्वारा जारी निर्देश में साफ किया गया है कि विशेषकर वर्षों से लंबित पड़े पुराने मामलों को अब मिशन मोड में सबसे पहले निपटाया जाए। इसके साथ ही, जिन संवेदनशील मामलों में अदालतों द्वारा समय-समय पर दिशा-निर्देश दिए गए हैं, उनके आधार पर एक विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करने को कहा गया है।
मुख्यालय रखेगा हाईटेक नजर, बनेगी नई एसओपी
पुलिस मुख्यालय ने जिला पुलिस कप्तानों को निर्देश दिया है कि एससी-एसटी एक्ट से संबंधित मामलों के अनुसंधान (जांच) का समुचित और गुणवत्तापूर्ण पर्यवेक्षण किया जाए। मुकदमों की जांच को शीघ्र पूरा करने के लिए जिले के अधिकारियों को आवश्यक और कड़े निर्णय समय पर लेने के आदेश दिए गए हैं।
महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामलों के समयबद्ध निष्पादन के लिए अब पूरी तरह तकनीकी आधारित मॉनिटरिंग की व्यवस्था लागू की जाएगी। इन मामलों की उच्च स्तर से लगातार निगरानी सुनिश्चित की जाएगी, ताकि जमीनी स्तर पर जांच में हो रही प्रगति की हर सप्ताह समीक्षा की जा सके। इससे जांच प्रक्रिया पारदर्शी बनेगी।
वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि मामलों की चार्जशीट (आरोप पत्र) समय पर दाखिल होने से पीड़ितों को मिलने वाली सरकारी वित्तीय सहायता और मुआवजा राशि भी समय पर मिल सकेगी। अदालती दिशा-निर्देशों के आधार पर तैयार एसओपी से जांच की कानूनी और तकनीकी खामियां दूर होंगी, जिससे कोर्ट में आरोपितों को सजा मिलने का प्रतिशत बढ़ेगा।
राजधानी रांची में दर्ज हैं सबसे अधिक लंबित मामले
झारखंड में वर्तमान में पुलिस अनुसंधान के स्तर पर एससी-एसटी एक्ट से संबंधित करीब 1,180 से 1,400 मामले लंबित हैं। हाल ही में गृह विभाग द्वारा नियमावली में बड़ा बदलाव कर इंस्पेक्टर और दारोगा (SI) को भी अनुसंधान का कानूनी अधिकार देने के बाद निष्पादन में तेजी आई है, लेकिन बैकलाग का दबाव अब भी बना हुआ है।
राज्य के विभिन्न जिलों में लंबित मामलों के आंकड़े इस प्रकार हैं:
- रांची: इस एक्ट के तहत सबसे अधिक 229 मामले लंबित हैं, जिनमें जमीन विवाद से जुड़े केस प्रमुख हैं।
- पलामू और गढ़वा: पलामू में 110 और गढ़वा जिले में 90 मामले वर्तमान में लंबित हैं।
- सिंहभूम और हजारीबाग: पूर्वी सिंहभूम में 85, पश्चिमी सिंहभूम में 80 और हजारीबाग में 80 केस पेंडिंग हैं।
- कोयलांचल क्षेत्र: धनबाद में 60, बोकारो में 55 और गिरिडीह जिले में 50 मामले लंबित हैं।
- संताल परगना: दुमका में 45 और साहिबगंज जिले में 40 मामले फाइलों में दबे हैं।
- कम पेंडेंसी वाले जिले: रामगढ़, जामताड़ा और खूंटी में 15-15 तथा कोडरमा में केवल 12 मामले लंबित हैं।
अनुसंधान अधिकारियों पर बढ़ा काम का भारी बोझ
पूर्व में नियम के तहत केवल डीएसपी (DSP) स्तर के अधिकारियों को ही इस एक्ट की जांच का जिम्मा दिया जाता था, जिससे एक-एक अधिकारी पर दर्जनों मामलों का भारी बोझ था। हालांकि, अब इंस्पेक्टर स्तर पर अधिकार मिलने से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन पुराने मामलों की केस डायरी अपडेट न होना अब भी बड़ी समस्या है।
ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी सत्यापन और वरीय अधिकारियों द्वारा सुपरविजन में होने वाली देरी भी मामलों के निष्पादन को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 15 से 17 प्रतिशत मामलों में पुख्ता साक्ष्य के अभाव या आपसी रंजिश के कारण कोर्ट में केस काफी कमजोर पाए जाते हैं।
Rohit Mahato

