UP में सिस्टम की क्रूरता! मानसिक रूप से बीमार दुष्कर्म पीड़िता को नहीं मिला इंसाफ, हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को जमकर फटकारा

Prayagraj News: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश की लचर चिकित्सा और बाल संरक्षण व्यवस्था पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कहा कि दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी अब राज्य सरकार की होगी।

यह दर्दनाक मामला मेरठ की एक 17 वर्षीय मानसिक रूप से अस्वस्थ दुष्कर्म पीड़िता से जुड़ा हुआ है। इस बेबस पीड़िता को अंततः गर्भ समाप्त कराने के कानूनी अधिकार के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अदालत ने इस मामले में सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर करते हुए जिम्मेदार अधिकारियों की जमकर खिंचाई की है।

एफआईआर के बाद भी भटकता रहा परिवार

मेरठ के थाना रोहता क्षेत्र में 11 जून 2023 को पीड़िता के नाना ने इस घिनौने अपराध की एफआईआर दर्ज कराई थी। पीड़िता न केवल नाबालिग थी, बल्कि मानसिक रूप से पूरी तरह अस्वस्थ थी। उसकी मां भी गंभीर मानसिक रोगी है, जबकि उसके पिता लगभग 10 साल पहले ही पूरे परिवार को बेसहारा छोड़कर जा चुके हैं।

मामले के बाद हुई चिकित्सा जांच में पता चला कि पीड़िता 22 सप्ताह और 6 दिन की गर्भवती है। पीड़िता ने डॉक्टरों के सामने स्पष्ट कहा था कि वह इस अनचाहे गर्भ को नहीं रखना चाहती। इसके बावजूद मेरठ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) ने नियमों का हवाला देकर गर्भ समाप्ति का उसका अनुरोध क्रूरतापूर्वक नामंजूर कर दिया।

बाल कल्याण समिति की बड़ी लापरवाही

इस संवेदनशील मामले में बाल कल्याण समिति ने भी बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया। समिति ने पीड़िता को उसके चाचा की देखरेख में सौंप दिया और साथ ही उसका गर्भपात न कराने का तुगलकी निर्देश जारी कर दिया। एफआइआर दर्ज होने के पूरे 54 दिन बीत जाने के बाद मजबूर होकर नाना को न्याय के लिए हाई कोर्ट आना पड़ा।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने इस पर नाराजगी जताते हुए सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िता के गर्भवती होने की सूचना मिलते ही पुलिस को उसी दिन उसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। कोर्ट ने सिस्टम को सुधारने के लिए कई कड़े दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।

हाई कोर्ट ने जारी किए कड़े दिशा-निर्देश

अदालत ने आदेश दिया है कि प्रदेश के हर जिले में पूरी तरह कार्यात्मक मेडिकल बोर्ड की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। इस बोर्ड का पुनर्गठन एक साल से अधिक समय तक न टाला जाए। बाल कल्याण समिति के हर आदेश में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख होना अनिवार्य है कि पीड़िता को एमटीपी अधिनियम के तहत उसके अधिकारों की पूरी जानकारी दी गई थी।

लापरवाह सीएमओ या बाल कल्याण समिति के अधिकारियों के खिलाफ जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कड़ी कार्रवाई की सिफारिश करेगा, जिससे उनका वेतन भी रोका जा सकेगा। मुख्य सचिव को तीन महीने के भीतर एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का आदेश मिला है, जो उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म पीड़िताओं की वास्तविक स्थिति का व्यापक अध्ययन करेगी।

बच्चों की सुरक्षा के लिए अलग कानून की मांग

न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से सिफारिश की है कि दुष्कर्म के परिणामस्वरूप जन्म लेने वाले बच्चों के स्वतंत्र अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक अलग कानूनी ढांचा तैयार किया जाए। न्यायमूर्ति दिवाकर ने भावुक होते हुए कहा कि किसी भी निर्दोष बच्चे को उसके जन्म की विषम परिस्थितियों के लिए कभी भी दंडित नहीं किया जा सकता है।

हाई कोर्ट ने राज्य के चौंकाने वाले आंकड़े साझा करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में 24 करोड़ की विशाल आबादी है। इसके बावजूद पिछले 11 वर्षों में केवल 106 मामलों में ही मेडिकल बोर्ड के माध्यम से कानूनी रूप से गर्भ समाप्ति की अनुमति दी गई। यानी प्रदेश के 75 जिलों में प्रति वर्ष 10 से भी कम मामले स्वीकृत हुए।

आंकड़ों ने खोली सरकारी दावों की पोल

जौनपुर, गोंडा और प्रयागराज जैसे बड़े जिलों ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट बनने के 52 साल बाद, पहली बार साल 2023 में मेडिकल बोर्ड का गठन किया। वहीं राज्य भर में बाल कल्याण समितियों के सामने साल 2022-23 में कुल 28,351 गंभीर मामले आए, लेकिन उनकी सहायता के लिए सहायक व्यक्तियों की संख्या मात्र 538 थी।

गोरखपुर में 1,142 मामलों की निगरानी के लिए केवल दो सहायक व्यक्ति तैनात थे, यानी एक अकेले व्यक्ति पर 571 बेसहारा बच्चों की भारी जिम्मेदारी थी। औरैया जिले में तो एक भी सहायक व्यक्ति मौजूद नहीं था। कोर्ट ने इस बात पर भी गहरा अफसोस जताया कि पांच वर्षों में महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव ने राज्य के बालिका गृहों का एक बार भी निरीक्षण नहीं किया।

Adv Anuradha Rajput

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