हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: महज जानकारी उगलवाने के लिए आरोपी को पुलिस कस्टडी में भेजना गैरकानूनी

Chandigarh News: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने देश की कानून व्यवस्था को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी भी आरोपी से केवल और अधिक जानकारी हासिल करने के लिए उसे पुलिस हिरासत में रखना कानून सम्मत नहीं है।

जस्टिस संजय वशिष्ठ की एकल पीठ ने कहा कि मामले में मुख्य रिकवरी हो जाने के बाद केवल अतिरिक्त जानकारी निकलवाने के उद्देश्य से कस्टोडियल इंटेरोगेशन यानी हिरासत में पूछताछ की मांग नहीं की जा सकती। ऐसा करना पूरी तरह दबाव या जबरदस्ती के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास माना जाएगा।

अवैध शराब के मामले में आया कोर्ट का फैसला

माननीय अदालत ने यह कड़ी टिप्पणी बठिंडा जिले के फूल थाना में दर्ज पंजाब आबकारी अधिनियम के एक मामले में आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए की है। हाई कोर्ट ने निचली सत्र अदालत द्वारा वापस ली गई अंतरिम अग्रिम जमानत को बहाल करते हुए उसे अब स्थायी कर दिया है।

इस मामले के अनुसार, आरोपी पर अवैध रूप से शराब बनाने और उसे भारी मात्रा में रखने का गंभीर आरोप था। बठिंडा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने शुरुआत में आरोपी को अंतरिम अग्रिम जमानत दे दी थी और उसे पुलिस जांच में नियमित शामिल होने के सख्त निर्देश दिए थे।

जांच अधिकारी ने दोबारा मांगी थी आरोपी की रिमांड

बाद में जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि आरोपी उन्नीस मई को जांच में शामिल हो चुका है। उसके पास से चार सौ लीटर लाहन और दस लीटर अवैध शराब की बरामदगी भी हो चुकी है। हालांकि अधिकारी ने दलील दी कि शराब के खरीदारों का पता लगाने के लिए रिमांड जरूरी है।

पुलिस चाहती थी कि आरोपी हिरासत में यह बताए कि शराब बनाने का सामान उसे किसने उपलब्ध कराया और तैयार शराब किसे बेची जानी थी। इस दलील के आधार पर सत्र अदालत ने अंतरिम संरक्षण वापस ले लिया था, जिसे अब हाई कोर्ट ने पूरी तरह गलत ठहराया है।

साक्ष्य जुटाना जांच एजेंसी का काम, आरोपी पर दबाव गलत

जस्टिस वशिष्ठ ने कहा कि सत्र अदालत ने यह जांचने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया कि रिकवरी के बाद वास्तव में हिरासत की जरूरत थी भी या नहीं। यदि जांच एजेंसी मुख्य खरीदारों की पहचान नहीं कर पा रही है, तो यह अग्रिम जमानत समाप्त करने का वैध आधार नहीं हो सकता।

अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह जांच एजेंसी की जिम्मेदारी है कि वह अपने कानूनी और पेशेवर तरीकों से साक्ष्य जुटाए। इसके लिए आरोपी पर मानसिक दबाव नहीं बनाया जा सकता। हाई कोर्ट ने आरोपी की अंतरिम जमानत को स्थायी करते हुए भविष्य में जांच में सहयोग करने के आदेश दिए हैं।

Author: Gurpreet Singh

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