Lucknow News: उत्तर प्रदेश में बिना सहमति के करीब 47 लाख उपभोक्ताओं का बिजली भार (लोड़) बढ़ाए जाने के पावर कॉरपोरेशन के फैसले को विद्युत नियामक आयोग में चुनौती दी गई है। इस फैसले से लगभग 15 लाख गरीब उपभोक्ता रियायती बिजली के दायरे से बाहर हो गए हैं।
प्रदेश में एक किलोवॉट लोड के साथ प्रति माह 100 यूनिट तक बिजली खर्च करने वालों को तीन रुपये प्रति यूनिट की रियायती दर पर बिजली मिलती है। जुलाई में पावर कॉरपोरेशन द्वारा अचानक लोड बढ़ा दिए जाने के बाद राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने सोमवार को आयोग में एक लोकमहत्व प्रस्ताव दाखिल किया है।
सप्लाई कोड में बदलाव करने के लिए सौंपा प्रस्ताव
नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार और सदस्य संजय कुमार सिंह को सौंपे गए इस प्रस्ताव में विद्युत आपूर्ति संहिता (सप्लाई कोड) में तत्काल संशोधन की मांग की गई है। परिषद ने दलील दी है कि त्योहारों या शादी-विवाह जैसे विशेष अवसरों पर अस्थायी रूप से लोड बढ़ने पर स्थायी लोड न बढ़ाया जाए।
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि गरीब उपभोक्ता स्वीकृत लोड से अधिक बिजली इस्तेमाल करने पर पहले ही दोगुना जुर्माना भरते हैं। ऐसे में उन्हें रियायती बिजली के लाभ से वंचित करना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है। उन्होंने इसे भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र के वादे के भी खिलाफ बताया।
बिजली खपत घटने के बावजूद लोड बढ़ने पर उठे सवाल
परिषद ने एक अन्य याचिका दाखिल कर बिजली की कुल खपत घटने के बावजूद स्वीकृत भार बढ़ाए जाने के मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में गरीब उपभोक्ताओं की सालाना औसत खपत 780 यूनिट थी, जो अब घटकर केवल 424 यूनिट रह गई है।
याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब प्रति उपभोक्ता औसत वार्षिक बिजली खपत में इतनी बड़ी गिरावट आई है, तो स्वीकृत लोड बढ़ाने का कोई तकनीकी या तार्किक आधार नहीं बनता। परिषद ने आशंका जताई है कि यह गरीब उपभोक्ताओं को सब्सिडी के दायरे से बाहर करने की एक सोची-समझी साजिश हो सकती है।

