Delhi News: देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एसवाई कुरैशी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ साल 2022 में हुई अपनी मुलाकात को लेकर कई बड़े दावे किए हैं। कुरैशी के मुताबिक, संघ प्रमुख ने उन्हें आश्वस्त किया था कि वे मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
अपनी नई किताब “इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट अ मेमॉयर” के विमोचन से पहले पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कुरैशी ने इस बैठक पर विस्तार से चर्चा की। इस प्रतिनिधिमंडल में पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पत्रकार शाहिद सिद्दीकी, उद्योगपति सईद शेरवानी और पूर्व उप-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जमीर उद्दीन शाह शामिल थे।
सरकार के बजाय आरएसएस के पास जाने की आलोचना पर कुरैशी ने कहा कि वे सीधे इस नफरती नैरेटिव के मुख्य स्रोत के पास जाना चाहते थे। उनके अनुसार, देश में जो लिंचिंग, अभद्र भाषा और ध्रुवीकरण हो रहा था, उसी को लेकर वे सीधे संघ प्रमुख से बात करना चाहते थे।
संविधान बदलने की कोई योजना नहीं, भागवत ने दिया भरोसा
एसवाई कुरैशी 30 जुलाई 2010 से 10 जून 2012 तक देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने खुद संघ प्रमुख से समय मांगा था। जब कुरैशी ने पूछा कि हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों का भविष्य क्या होगा, तो भागवत ने कहा कि भारत हमेशा से हिंदू राष्ट्र था और रहेगा।
भागवत ने यह भी साफ किया कि वे देश का संविधान बदलने की कोई योजना नहीं बना रहे हैं। कुरैशी के अनुसार, भागवत का मानना है कि वे इसी संविधान के दायरे में रहते हुए वह सब कुछ हासिल कर रहे हैं जो वे करना चाहते थे। उन्होंने इसी संविधान के भीतर हिंदू राष्ट्र स्थापित कर लिया है।
बैठक के दौरान आरएसएस प्रमुख ने भी रखीं अपनी शिकायतें
मुलाकात के दौरान मोहन भागवत ने भी मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल के सामने हिंदुओं की कुछ शिकायतें रखीं। उन्होंने कहा कि हिंदुओं को गोहत्या पसंद नहीं है और मुसलमानों द्वारा हिंदुओं को काफिर कहे जाने पर आपत्ति है। इस पर प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि गोहत्या पर प्रतिबंध लगाना सरकार के हाथ में है।
काफिर शब्द पर प्रतिनिधिमंडल ने स्पष्ट किया कि यह कोई गाली नहीं है, बल्कि एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ गैर-विश्वासी होता है। हालांकि, उन्होंने भरोसा दिया कि यदि हिंदुओं को यह बुरा लगता है, तो मुसलमानों को इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए। वहीं मुसलमानों को पाकिस्तानी और जिहादी कहे जाने पर भागवत ने भी इसे गलत माना।
तनाव कम करने के लिए आपसी संवाद ही एकमात्र रास्ता
कुरैशी ने अपनी किताब के एक अध्याय ‘द डे वी मेट मोहन भागवत’ में लिखा है कि इस मुलाकात के बाद से अब तक उनकी संघ प्रमुख के साथ तीन और बैठकें हो चुकी हैं। हर बैठक में भागवत इसी बात को दोहराते हैं कि देश का संविधान ही सर्वोपरि है।
भागवत का मानना है कि मुसलमान भारत के ही नागरिक हैं। सदियों से चले आ रहे इस हिंदू-मुस्लिम तनाव को रातोंरात हल नहीं किया जा सकता है। इसके समाधान के लिए समाज के सभी पक्षों को धैर्य रखना होगा और लगातार आपस में संवाद करते रहना होगा।
