हिमाचल प्रदेश में वीआईपी संस्कृति बनाम कर्तव्यनिष्ठा, दो अलग-अलग उदाहरणों ने प्रशासनिक कार्यशैली पर खड़े किए बड़े सवाल

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश में हाल ही में दो ऐसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं जो प्रशासनिक सेवा के भीतर छिपे गहरे अंतर को उजागर करते हैं। पहले मामले में राज्य निर्वाचन आयुक्त अनिल खाची अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वीआईपी सरकारी आवास छोड़कर निजी घर में चले गए।

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दूसरी ओर जनजातीय जिला लाहुल-स्पीति के एक सुदूर पोलिंग बूथ पर तैनात स्वास्थ्य कार्यकर्ता पलजोम बुट्टी ने अद्भुत साहस दिखाया। उन्होंने राष्ट्रीय सघन पोलियो प्रतिरक्षण अभियान की ड्यूटी निभाने के लिए एक उफनते हुए पहाड़ी नाले को खतरनाक बुलडोजर पर बैठकर पार किया और मिसाल कायम की।

अधिकारियों के अधिकार भाव बनाम कर्तव्यनिष्ठा का बड़ा सवाल

जिस पहाड़ी राज्य में कई बड़े प्रशासनिक अधिकारी अपने अधिकार की भावना यानी सेंस ऑफ एंटाईटलमेंट का सार्वजनिक प्रदर्शन करने के लिए चर्चित रहते हों, वहां ऐसे सकारात्मक उदाहरण बेहद जरूरी हो जाते हैं। निर्वाचन आयुक्त द्वारा समय से पहले मकान खाली करना प्रशासनिक आत्मसम्मान, व्यवस्था और अनुशासन को साफ दर्शाता है।

इसके ठीक उलट राज्य में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर मुख्यालय को पौने दो लाख रुपये से अधिक की पेनल्टी लगानी पड़ी। यह जुर्माना पद छोड़ने के बाद भी लंबे समय तक सरकारी वीआईपी बंगले पर अवैध रूप से कब्जा बनाए रखने के कारण लगाया गया, जो व्यवस्था पर सवाल है।

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पुराने दौर का आपसी तालमेल और वर्तमान स्थिति में अंतर

प्रशासनिक सेवाओं में पहले भी आपसी मतभेद होते थे, लेकिन उनका कभी भी इस तरह से सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया जाता था। साल 1997 में जब आईएएस अधिकारी मनीषा श्रीधर कांगड़ा से शिमला की उपायुक्त बनकर गईं, तब निवर्तमान अधिकारी ने पहले ही गरिमा दिखाते हुए अपना सामान समेट लिया था।

इसी तरह तरुण श्रीधर के बिलासपुर का उपायुक्त बनने पर पुराने अधिकारी सरोज कुमार दाश के परिवार ने उन्हें अपने साथ रहने का निमंत्रण दिया था। इसके विपरीत आज के दौर में सरकारी आवासों पर कब्जे को लेकर मामले उच्च न्यायालय की दहलीज तक पहुंच रहे हैं, जो चिंताजनक है।

सरकारी धन का दुरुपयोग और महिला स्वास्थ्य कर्मियों का अद्भुत जज्बा

आजकल सत्ता परिवर्तन होते ही अधिकारी अपने नए बंगले का पुनरुद्धार और रंग-रोगन करवाने में जुट जाते हैं। यहां तक कि रियल एस्टेट अथॉरिटी से लाखों रुपये के कीमती सेब दूसरे राज्यों के अफसरों को भेजने और पार्टियों के भारी बिल सरकारी खजाने पर मढ़ने के मामले भी सामने आए हैं।

इस पूरी वीआईपी संस्कृति के बीच पलजोम बुट्टी जैसी कम वेतन पाने वाली महिला कर्मचारी बिना किसी शिकायत के सिर्फ अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित रखती हैं। इससे पहले मंडी की कमला देवी ने उफनती नदी पार की थी, जिसके लिए उन्हें सीरम इंस्टीट्यूट से बड़ा सम्मान मिला था।

मंडी के सराज क्षेत्र की आशा वर्कर गीता देवी को भी दुर्गम इलाकों में सफल टीकाकरण के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया था। वहीं कुल्लू की निर्मला ने भी मलाणा के बर्फीले रास्तों पर 15 किलोमीटर पैदल चलकर अपनी ड्यूटी को बखूबी अंजाम दिया था।

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