National News: सस्पेंस और थ्रिलर से भरी ‘दृश्यम’ जैसी फिल्में और क्राइम वेब सीरीज आज मनोरंजन का बड़ा जरिया हैं। लेकिन भारतीय पुलिस ने हाल ही में एक बेहद डरावने ट्रेंड की ओर इशारा किया है। कई जघन्य हत्याओं की जांच में यह सामने आया है कि अपराधियों ने सबूत मिटाने और शव छिपाने के लिए फिल्मी तरीकों का सहारा लिया। हालांकि, कातिल यह भूल गए कि असल जिंदगी में फॉरेंसिक जांच, डीएनए टेस्ट और आधुनिक तकनीकी निगरानी से बचना नामुमकिन है।
राज्यों में सामने आए दहला देने वाले मामले
देश के अलग-अलग हिस्सों से हाल ही में ऐसे चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं, जहां अपराधियों ने पुलिस को गुमराह करने की हर मुमकिन कोशिश की। अहमदाबाद में एक शख्स का शव उसके ही घर के किचन के फर्श के नीचे दफन मिला। वहीं, जूनागढ़ में पुलिस ने 13 महीने बाद एक पुराने कुएं से कंकाल बरामद किया। कानपुर और चंद्रपुर जैसे शहरों में भी आरोपियों ने वीआईपी इलाकों में शव छिपाकर और फर्जी सुराग लगाकर जांच एजेंसियों को भटकाने की खतरनाक कोशिशें की थीं।
पुलिस के अनुसार, इन सभी मामलों में एक पैटर्न बिल्कुल सामान्य था। अपराधियों ने शव को ठिकाने लगाने के बाद फर्जी गुमशुदगी की कहानियां बनाईं और मोबाइल फोन बंद कर दिए। कई मामलों में डिजिटल सबूत मिटाने के लिए तकनीकी छेड़छाड़ भी की गई। पाटन में तो एक महिला ने अपनी ही मौत का फर्जी नाटक रच दिया ताकि वह अपने प्रेमी के साथ भाग सके। इन आरोपियों को लगा कि वे फिल्मों की तरह पुलिस को चकमा दे देंगे, लेकिन फॉरेंसिक साइंस ने उनकी पोल खोल दी।
तकनीक और फॉरेंसिक ने किया सच का सामना
अपराधियों द्वारा रची गई इन ‘परफेक्ट’ साजिशों के खिलाफ तकनीकी और वैज्ञानिक तरीके सबसे बड़े हथियार साबित हुए। जांच एजेंसियों ने सच्चाई तक पहुंचने के लिए आधुनिक डीएनए प्रोफाइलिंग और सीसीटीवी फुटेज का गहन विश्लेषण किया। इसके अलावा कॉल रिकॉर्ड डिटेल्स (CDR), डिजिटल ट्रेल और क्राइम सीन की बारीकी से की गई फॉरेंसिक मैपिंग ने कातिलों के झूठ को बेनकाब कर दिया। तकनीकी निगरानी ने उन फर्जी कहानियों को ध्वस्त कर दिया जिन्हें आरोपियों ने महीनों तक सच बनाकर पेश किया था।
अहमदाबाद का समीर अंसारी हत्याकांड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। समीर एक साल से लापता था और उसकी पत्नी रूबी अपने प्रेमी के साथ मिलकर उसकी हत्या कर चुकी थी। आरोपियों ने समीर के शव के टुकड़े कर किचन में दफना दिए और ऊपर से टाइल्स लगवा दीं। रूबी महीनों तक उसी घर में अपने बच्चों के साथ रही और पड़ोसियों को पति के बाहर जाने की झूठी कहानी सुनाती रही। लेकिन क्राइम ब्रांच की बारीकी और फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की मदद से फर्श के नीचे दफन राज बाहर आ गया।
पूर्व पुलिसकर्मी की शातिर चाल भी हुई फेल
चंद्रपुर का मामला और भी पेचीदा था क्योंकि यहां आरोपी खुद एक पूर्व पुलिस कांस्टेबल नरेश दाहुले था। उसने पुलिसिया कार्यप्रणाली के अपने अनुभव का इस्तेमाल कर सीसीटीवी के सिम कार्ड के साथ छेड़छाड़ की। बदबू छिपाने के लिए उसने एक आवारा कुत्ते को मारकर शव के पास फेंक दिया ताकि लोग उसे कुत्ते के सड़ने की गंध समझें। लेकिन एक मामूली स्कूटर चोरी के मामले में पकड़े जाने के बाद जब कड़ी पूछताछ हुई, तो उसका सारा शातिराना जाल ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
पाटन में गीता आहिर नाम की महिला ने तो क्रूरता की हदें पार कर दीं। उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर एक अधेड़ व्यक्ति की हत्या की और उसे अपने कपड़े और पायल पहना दिए ताकि पुलिस उसे गीता का शव समझे। उसका मकसद अपनी मौत का नाटक कर समाज से गायब होना था। जांच एजेंसियां चेतावनी देती हैं कि फिल्में सिर्फ कल्पना होती हैं, लेकिन फॉरेंसिक सबूत हकीकत में हर अपराधी को सलाखों के पीछे पहुंचाने की ताकत रखते हैं।


