New Delhi News: देश में खाद्य तेलों की घरेलू मांग में लगातार भारी इजाफा देखा जा रहा है। उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी एसईए द्वारा शुक्रवार को जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस साल मई महीने में भारत का खाद्य तेल आयात करीब 6.7 प्रतिशत बढ़ गया है।
आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, मई में देश का कुल खाद्य तेल आयात बढ़कर लगभग 13.39 लाख टन के स्तर पर पहुंच गया है। बाजार जानकारों का कहना है कि भारतीय रसोईघरों में कच्चे सोयाबीन तेल की बढ़ती भारी मांग ही इस बार आयात में हुई इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह रही है।
सोयाबीन तेल की मांग ने पाम ऑयल को पछाड़ा
एसईए के आंकड़ों के मुताबिक, वनस्पति तेल का आयात मई में बढ़कर 13,38,936 टन दर्ज हुआ, जो पिछले साल इसी अवधि में 12,54,883 टन था। वनस्पति तेलों की इस श्रेणी में खाने वाले खाद्य तेल और औद्योगिक इस्तेमाल में आने वाले गैर-खाद्य तेल दोनों ही शामिल हैं।
यह महत्वपूर्ण वृद्धि मुख्य रूप से कच्चे सोयाबीन तेल के आयात में तेज उछाल के कारण हुई है। समीक्षाधीन अवधि के दौरान कच्चे सोयाबीन तेल का आयात 3,98,585 टन से काफी बढ़कर 4,93,854 टन हो गया। इस तेल का दाम पाम ऑयल के मुकाबले बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी होना है।
कुल वनस्पति तेल आयात में 8 प्रतिशत का बड़ा उछाल
इसके अलावा गैर-खाद्य तेलों का आयात भी पिछले महीने दोगुने से अधिक बढ़कर 26,202 टन हो गया, जो मई 2025 में सिर्फ 12,040 टन था। इससे मई 2026 में भारत का कुल वनस्पति तेल आयात 8 प्रतिशत बढ़कर 13.65 लाख टन के पार पहुंच गया।
मौजूदा तेल वर्ष 2025-26 के पहले सात महीनों (नवंबर 2025 से मई 2026) के दौरान देश का कुल वनस्पति तेल आयात 12 प्रतिशत बढ़कर 93.65 लाख टन हो गया है। जबकि साल 2024-25 की इसी समान अवधि में यह आंकड़ा करीब 83.39 लाख टन दर्ज किया गया था।
एसईए ने बताया कि वैश्विक स्तर पर कीमतों में बदलाव के बाद सरकार ने एक जून से कच्चे पाम तेल पर शुल्क मूल्य बढ़ाकर 1,218 डॉलर प्रति टन कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ कच्चे सोयाबीन तेल पर लगने वाले शुल्क मूल्य में थोड़ी कटौती की गई है।
मेक इन इंडिया नीति से घरेलू रिफाइनिंग को मिला बूस्ट
सरकारी नीति के कारण मई 2026 में रिफाइंड पामोलीन का कोई आयात नहीं हुआ। नवंबर 2025 से मई 2026 के बीच इसका आयात भारी गिरावट के साथ सिर्फ 47,270 टन रह गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 8,26,800 टन के बहुत ऊंचे स्तर पर था।
एसईए के मुताबिक कच्चे और रिफाइंड तेल के बीच शुल्क अंतर बनाए रखने की सरकारी नीति से घरेलू रिफाइनिंग को काफी बढ़ावा मिला है। इससे देश में रोजगार सृजन में मदद मिली है। इस अवधि में रिफाइंड तेल का हिस्सा घटकर सिर्फ तीन प्रतिशत रह गया है।
Author: Rajesh Kumar


