Politics News: सोशल मीडिया पर राजनीतिक विचारों को साझा करना आजकल बड़े विवादों को जन्म देता है। हाल ही में कोटा में छात्रों को अंग्रेजी में संबोधित करते राहुल गांधी पर की गई एक सामान्य टिप्पणी के बाद ‘एक्स’ पर बवंडर खड़ा हो गया। कांग्रेस समर्थकों द्वारा की गई ट्रोलिंग ने देश की वर्तमान राजनीतिक असहिष्णुता को उजागर किया है।
देश का एक बड़ा वर्ग आर्थिक मोर्चे पर वामपंथी सोच का विरोधी है, लेकिन भारत की अखंडता के लिए धर्मनिरपेक्षता को जरूरी मानता है। आज अनेक ऐसे मतदाता हैं जो कांग्रेस को वोट देना चाहते हैं, बशर्ते उसका नेतृत्व गांधी परिवार के अलावा किसी अन्य योग्य और जमीनी नेता के हाथों में हो।
सोनिया गांधी की नीतियां और कांग्रेस का पतन
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी ने अपने बच्चों के राजनीतिक भविष्य के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय दल को कमजोर कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रणनीतिकार भी मानते हैं कि जब तक राहुल गांधी विपक्ष के मुख्य चेहरा रहेंगे, तब तक भाजपा को हराना लगभग असंभव है।
इंदिरा गांधी के दौर में परिवारवाद की शुरुआत जरूर हुई थी, लेकिन उनके समय में राज्यों में ताकतवर मुख्यमंत्री हुआ करते थे। सोनिया गांधी ने इस परंपरा को बदलकर यह सुनिश्चित किया कि कोई भी क्षेत्रीय नेता उनके बच्चों से बड़ा कद न पा सके। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल से सिमटकर एक परिवार की निजी जागीर जैसी बन गई।
सत्ता जाते ही बिखर रहे हैं क्षेत्रीय दल
इतिहास गवाह है कि जो दल किसी परिवार की संपत्ति बन जाते हैं, वे सत्ता हाथ से निकलते ही ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगते हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल के चुनावों में ममता बनर्जी की हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में बड़ी टूट देखने को मिली है। यही स्थिति महाराष्ट्र में शरद पवार की राकांपा के साथ भी हुई थी।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी आज अपने सांसदों की बगावत के कारण टूटने की कगार पर है। हालांकि उनके प्रवक्ता विपक्ष पर साजिश और धनबल के आरोप लगा रहे हैं, लेकिन कड़वा सच यह है कि इन दलों के युवा नेताओं में जमीन पर कड़ी मेहनत करने के जज्बे की भारी कमी है।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की जड़ें देश के कोने-कोने में लगातार मजबूत हो रही हैं। कांग्रेस में साल 2014 के बाद से बड़े और जनाधार वाले नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब वहां केवल दरबारी नेता ही बचे हैं।
देश के युवाओं में इस समय पेपर लीक और बेरोजगारी को लेकर गहरी मायूसी और गुस्सा है। लेकिन विपक्ष इस जन-आक्रोश का लाभ उठाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। जब तक राहुल और प्रियंका गांधी राजनीति को लेकर पूरी तरह गंभीर नहीं होते, तब तक साल 2029 में भी मोदी को सत्ता से हटाना नामुमकिन लगता है।
Author: Harikarishan Sharma

