शादी या आजादी? 2030 तक आधी महिलाएं क्यों रहना चाहती हैं कुंवारी, चौंका देगी वजह!

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National News: आधुनिक दौर में विवाह संस्था के मायने तेजी से बदल रहे हैं। बाजारवाद और बदलती जीवनशैली के कारण शादियों में दिखावा बढ़ा है, लेकिन रिश्तों की आत्मीयता कम हुई है। महिलाएं अब अपनी पहचान और वित्तीय स्वतंत्रता को अधिक महत्व दे रही हैं, जिससे पारंपरिक पारिवारिक ढांचा बदल रहा है।

दिखावे की संस्कृति ने पवित्र विवाह बंधन को बाजार का हिस्सा बना दिया है। लोग शादियों पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाते हैं। मगर इसके बाद भी घरेलू हिंसा और तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि लोगों में अब रिश्ते निभाने की इच्छाशक्ति कमजोर हो रही है।

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मॉर्गन स्टैनली की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

ग्लोबल सर्वे एजेंसी मॉर्गन स्टैनली की रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया है। इसके अनुसार वर्ष 2030 तक 25 से 44 वर्ष की लगभग 45 फीसदी महिलाएं अविवाहित रहने का फैसला कर सकती हैं। आधुनिक लड़कियां अब शादी के बजाय अपने शानदार करियर, उच्च शिक्षा और निजी खुशियों को ज्यादा तरजीह दे रही हैं।

अब महिलाएं ऐसे किसी भी रिश्ते में समझौता करने को तैयार नहीं हैं, जहां उन्हें बराबरी का हक न मिले। शिक्षित होने के बाद महिलाओं के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव आया है। शहरी परिवारों में बेटियों को बेटों के समान अवसर मिल रहे हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अब भी बड़ा सुधार बाकी है।

सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट और विवादों के बीच देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद गंभीर टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि पत्नी कोई नौकरानी नहीं है। घर का काम संभालना सिर्फ महिला की जिम्मेदारी नहीं है। काम न करने को तलाक का आधार बिल्कुल नहीं बनाया जा सकता।

यह नया बदलाव केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है। भारतीय महिलाओं में भी अब अकेले रहने या बिना बच्चों के रहने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। बेहतर पेशेवर विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने महिलाओं को अपने जीवन के फैसले खुद लेने की बड़ी ताकत और हिम्मत दी है।

पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को बचाने के लिए पुरुष और महिला के योगदान को समान दर्जा देना होगा। महिलाओं को शादी के बाद भी अपनी स्वतंत्र वित्तीय पहचान बनाए रखने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए। जब तक समाज घरेलू काम को पितृसत्तात्मक नियंत्रण से मुक्त नहीं करेगा, तब तक वास्तविक समानता अधूरी रहेगी।

Author: Karuna Sen

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