Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश के आधुनिक इतिहास में 23 जून का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन सूबे के छह बार मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय राजा वीरभद्र सिंह की जयंती का है। समर्थकों के बीच आधुनिक हिमाचल के शिल्पकार माने जाने वाले वीरभद्र सिंह आज भी लोगों की यादों में जिंदा हैं।
वीरभद्र सिंह का जन्म 23 जून 1934 को बुशहर रियासत के राजपरिवार में हुआ था। उन्होंने राजशाही के ऐशो-आराम को छोड़कर लोकतंत्र के रास्ते जनता की सेवा चुनी। सन 1962 में वह मात्र 28 वर्ष की आयु में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए थे। उस समय वह देश के सबसे युवा सांसद थे।
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने की दूरदर्शी सोच
शुरुआती दौर में हिमाचल में सड़कें और संचार के साधन बहुत सीमित थे। युवा सांसद के तौर पर वीरभद्र सिंह ने किन्नौर, पांगी, भरमौर और लाहौल-स्पीति जैसे दुर्गम इलाकों की पैदल यात्राएं कीं। उन्होंने जमीनी स्तर पर जनता की समस्याओं को समझा और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने सीमांत क्षेत्रों का मुद्दा उठाया।
वीरभद्र सिंह का मानना था कि सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों का विकास केवल स्थानीय जरूरत नहीं है। यह मुद्दा देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता से सीधे जुड़ा हुआ था। इसी दूरदर्शी सोच के कारण उन्होंने आगे चलकर मुख्यधारा से कटे हुए सुदूर ग्रामीण इलाकों को विकास के बड़े प्रोजेक्ट से जोड़ने का ऐतिहासिक काम किया
छह बार मुख्यमंत्री बनकर रचा राजनीति में बड़ा इतिहास
राजा वीरभद्र सिंह का राजनीतिक करियर छह दशकों से भी अधिक लंबा रहा है। वह पांच बार लोकसभा सांसद चुने गए और उन्होंने केंद्र सरकार में मंत्री पद भी संभाला। इसके अलावा वह छह बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। लगभग बाईस वर्षों तक राज्य का नेतृत्व करना उनके प्रति अटूट जनविश्वास को दर्शाता है।
उन्होंने हिमाचल के पहाड़ी इलाकों में सड़क निर्माण को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि कनेक्टिविटी के बिना शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का विस्तार असंभव है। उनके शासनकाल में हजारों गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ा गया। इस बुनियादी विकास ने हिमाचल प्रदेश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया।
शिक्षा, स्वास्थ्य और बागवानी क्षेत्र में किए बेहतरीन सुधार
वीरभद्र सिंह ने मानव संसाधन के महत्व को समय रहते पहचान लिया था। उन्होंने राज्य में स्कूलों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों का बड़ा नेटवर्क स्थापित किया। इसके साथ ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों का विस्तार किया। इस दूरगामी नीति से गरीब बच्चों को घर के पास शिक्षा और इलाज मिलना शुरू हुआ।
हिमाचल की सेब अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में भी उनकी नीतियां गेम चेंजर साबित हुईं। उन्होंने बागवानों के हितों की रक्षा के लिए कई बड़े कदम उठाए और ग्रामीण मार्केट को सुदृढ़ किया। आज अगर देश में हिमाचल की पहचान एक समृद्ध फल उत्पादक राज्य के रूप में होती है, तो इसके पीछे उनकी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति है।
वीरभद्र सिंह केवल विकास पुरुष नहीं थे, बल्कि वे देव संस्कृति के बड़े संरक्षक थे। वे स्थानीय मेलों, लोकगीतों और परंपराओं को समाज की आत्मा मानते थे। उन्होंने शासन व्यवस्था में हिमाचलियत के गौरव को हमेशा केंद्र में रखा। साहित्य और इतिहास के प्रति उनका गहरा लगाव आज भी नई पीढ़ी के लिए एक बड़ी प्रेरणा है।

