Beijing News: चीन में भारत के नवनियुक्त राजदूत विक्रम दोराईस्वामी ने अपने कार्यकाल के पहले महीने में ही तिब्बत का दौरा कर नई हलचल पैदा कर दी है। गुरुवार, 11 जून को ल्हासा पहुंचे राजदूत दोराईस्वामी का यह दौरा कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए आधिकारिक तौर पर आयोजित किया गया था, लेकिन इसके गहरे कूटनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।
यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब दोनों एशियाई दिग्गज अपने द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। चीनी भाषा में निपुण दोराईस्वामी का बीजिंग से बाहर यह पहला आधिकारिक प्रवास है। यह यात्रा दर्शाती है कि भारत और चीन के बीच चल रहे कूटनीतिक संवाद में अब सक्रियता बढ़ रही है और विश्वास बहाली के प्रयास तेज हो गए हैं।
गलवान के बाद संबंधों की चुनौती
साल 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से भारत और चीन के रिश्ते अब तक के सबसे निचले स्तर पर रहे हैं। सीमा पर तनाव के कारण कूटनीतिक यात्राओं में कमी आई थी, लेकिन हाल के घटनाक्रम संकेत देते हैं कि दोनों देश अब तनाव कम करने के लिए गंभीर हैं। चीन ने पिछले साल तीर्थयात्रियों के लिए तिब्बत का मार्ग खोलकर एक सकारात्मक पहल की थी।
लिपुलेख दर्रा और भू-राजनीतिक समीकरण
इस बार की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे से तीर्थयात्रा को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। हालांकि, इस क्षेत्र को लेकर नेपाल का अपना दावा है, जिसने इस घोषणा पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया है। ऐसे में भारतीय राजदूत का यह दौरा क्षेत्रीय जटिलताओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सीमा विवाद और द्विपक्षीय बातचीत
राजदूत का यह दौरा सीमा मामलों पर हो रही हालिया उच्च-स्तरीय वार्ताओं के बाद हुआ है। दो सप्ताह पूर्व बीजिंग में दोनों पक्षों ने सीमावर्ती इलाकों में शांति बनाए रखने पर सहमति जताई थी। भारत और चीन के बीच 3,200 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर बुनियादी ढांचे का निर्माण दोनों देशों के लिए चिंता और प्रतिस्पर्धा का एक बड़ा विषय बना हुआ है।
भविष्य की संभावनाएं
अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने जैसे हालिया विवादों के बावजूद, राजदूत स्तर की यह यात्रा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संचार को जीवित रखने की कोशिश है। शांति और स्थिरता के प्रति दोनों पक्षों का समर्थन यह स्पष्ट करता है कि बातचीत ही समाधान का इकलौता रास्ता है। आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच अन्य कूटनीतिक बैठकों पर सभी की नजरें टिकी होंगी।
Author: Rajesh Kumar


