Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के साथ जंगली जानवरों का आतंक किसानों के लिए बहुत बड़ा संकट बन गया है। मौसम की मार से ज्यादा नुकसान जंगली जानवर पहुंचा रहे हैं। फसलें बर्बाद होने से हताश होकर कई गांव के लोग अब खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
वन विभाग द्वारा करवाई गई बंदरों की गणना चौंकाने वाले आंकड़े दिखाती है। वर्ष 2015 में राज्य में बीस लाख से अधिक बंदर थे। साल 2019 तक यह संख्या एक लाख छतीस हजार के करीब दर्ज की गई। सरकार ने इनकी आबादी रोकने के लिए नसबंदी का अभियान भी चलाया।
साल 2006 में शुरू हुए नसबंदी कार्यक्रम में अब तक एक लाख छियासी हजार से ज्यादा बंदरों की नसबंदी की गई है। इसके बावजूद किसानों को कोई खास राहत नहीं मिल सकी है। बंदरों का आतंक खेतों में लगातार बढ़ रहा है। किसान हर दिन अपनी फसलें लुटते हुए देख रहे हैं।
हर साल करोड़ों का नुकसान
बंदरों के अलावा नीलगाय, जंगली सूअर, भालू, मोर और तोते भी भारी तबाही मचाते हैं। ये जानवर हर साल किसानों और बागवानों को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। ज्ञान विज्ञान समिति की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में सालाना करीब तेईस सौ करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
समिति ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कई और हैरान करने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की सत्तर प्रतिशत से ज्यादा पंचायतें जंगली जानवरों के आतंक से बुरी तरह प्रभावित हैं। अगर किसान फसलों की रखवाली की जगह मजदूरी करते, तो वे बारह सौ करोड़ रुपये कमा सकते थे।
इस भयानक नुकसान में बागवानी क्षेत्र को सौ करोड़ और कृषि फसलों को दो सौ करोड़ का घाटा हो रहा है। जानवरों के डर से खेती छोड़ने के कारण पांच सौ करोड़ का नुकसान अलग से आंका गया है। इन तमाम नुकसानों के चलते किसान पूरी तरह टूट चुके हैं।
किसानों का ‘खेती बचाओ अभियान’
किसानों और कई संगठनों ने मिलकर कई सालों तक ‘खेती बचाओ अभियान’ चलाया। इसके बाद राज्य सरकार को ‘मुख्यमंत्री कृषि उत्पाद संरक्षण योजना’ की शुरुआत करनी पड़ी। वहीं केंद्र सरकार ने भी नियमों में बदलाव कर बंदरों को कुछ समय के लिए ‘वर्मिन’ घोषित करते हुए मारने की अनुमति दी।
कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के अस्सी प्रतिशत से अधिक हिस्से में खेती बारिश पर निर्भर है। यहां लगभग नवासी प्रतिशत किसान लघु और सूक्ष्म श्रेणी में आते हैं। प्रदेश की केवल ग्यारह प्रतिशत भूमि ही कृषि योग्य है। कृषि और बागवानी जीडीपी में तेरह प्रतिशत योगदान देते हैं।
जंगली जानवरों की यह समस्या सीधे उस साठ प्रतिशत आबादी पर हमला है, जो खेती से अपनी आजीविका कमाती है। मंडी जिले के किसान अजय ठाकुर बताते हैं कि पिछले बीस सालों में जानवरों का खौफ बहुत बढ़ गया है। उन्होंने मक्की और सोयाबीन जैसी फसलें उगाना लगभग छोड़ दिया है।
फसलों का बदलता हुआ पैटर्न
पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भी अपने शोध में बेहद चिंताजनक नतीजे पेश किए हैं। उनके अनुसार जंगली जानवरों के कारण कुल बोई गई भूमि में सत्रह प्रतिशत की बड़ी कमी आई है। किसान अब मजबूरी में हल्दी और अदरक जैसी फसलें उगा रहे हैं जिन्हें जानवर कम खाते हैं।
शिमला के बागवान संजय चौहान कहते हैं कि मौसम बदलने से जंगलों में प्राकृतिक भोजन कम हुआ है। इसलिए जानवर अब भोजन की तलाश में सीधे गांवों और खेतों में घुस रहे हैं। बंदर, भालू और तोते अकेले बीस प्रतिशत तक फल बर्बाद कर देते हैं जिससे करोड़ों का नुकसान होता है।
हिमाचल में करीब दस लाख लोग सीधे बागवानी से जुड़े हुए हैं। पिछले पैंतीस सालों में बागवानी का क्षेत्र काफी तेजी से बढ़ा है। राज्य में सेब का सालाना कारोबार लगभग पांच हजार करोड़ रुपये का माना जाता है। ऐसे में जंगली जानवर बागवानों की आर्थिक कमर पूरी तरह तोड़ रहे हैं।
तोतों से सेब को बचाना नई चुनौती
शिमला जिले के सेब उत्पादक रोहित शर्मा बताते हैं कि तोतों से सेब को बचाना अब एक नई चुनौती बन गया है। सेब जब थोड़ा बड़ा होता है तो तोते हमला कर देते हैं। अकेले तोते ही पांच से सात प्रतिशत फसल को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।
सुबह और शाम के समय तोतों का आतंक सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। बागवानों को रखवाली के लिए अलग से मजदूर लगाने पड़ते हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है। किसान सभा के अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर कहते हैं कि जानवरों का यह आतंक अब असामान्य रूप से बढ़ गया है।
डॉक्टर तंवर का कहना है कि सरकार को इस समस्या को प्राथमिकता देनी चाहिए। वे जानवरों की आबादी के वैज्ञानिक प्रबंधन की मांग करते हैं। उनका सुझाव है कि मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत फसल रखवाली को मान्यता मिले। ऐसा होने पर ही हताश किसानों को थोड़ी बहुत वास्तविक राहत मिल सकेगी।
हिमाचल की पहाड़ी कृषि वर्तमान में जलवायु परिवर्तन और जंगली जानवरों की दोहरी मार झेल रही है। यह समस्या अब एक भयंकर प्राकृतिक आपदा से भी बड़ी बन चुकी है। अगर जल्दी ही कोई वैज्ञानिक नीति नहीं बनाई गई, तो हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट में डूब जाएगी।
Author: Sunita Gupta


