Uttarakhand Madrasa Education Rules: उत्तराखंड के मदरसों में अब नहीं चलेगी मनमानी, केवल तय धार्मिक पाठ्यक्रम पढ़ाने की मिलेगी अनुमति

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Dehradun News: उत्तराखंड सरकार ने राज्य के मान्यता प्राप्त स्कूल मदरसों के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक फैसला लिया है। अब इन शैक्षणिक संस्थानों में केवल उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण द्वारा तैयार धार्मिक पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जाएगा। इसके साथ ही किसी भी छात्र को यह कोर्स जबरन पढ़ाने पर पूरी तरह रोक रहेगी।

नए नियमों के तहत धार्मिक शिक्षा देने का समय भी पूरी तरह तय कर दिया गया है। स्कूल मदरसे इस विशेष पाठ्यक्रम को नियमित कार्यदिवस के आठ वादन से पहले या फिर छुट्टी के बाद ही पढ़ा सकेंगे। इस व्यवस्था की पारदर्शिता जांचने के लिए प्राधिकरण की टीम समय-समय पर भौतिक निरीक्षण करेगी।

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धार्मिक शिक्षा के संचालन के लिए कराना होगा नया पंजीकरण

उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के नियमों के अनुसार अब मदरसों को धार्मिक शिक्षा के लिए अलग से नया पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। इस प्रक्रिया के तहत कक्षा आठवीं तक संचालित होने वाले संस्थानों से पांच हजार रुपये का आवेदन शुल्क लिया जाएगा।

वहीं कक्षा 12वीं तक शिक्षा देने वाले उच्च संस्थानों के लिए यह पंजीकरण शुल्क साढ़े सात हजार रुपये निर्धारित किया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्राधिकरण को राज्य भर से अब तक धार्मिक शिक्षा प्रारंभ करने के लिए कुल 20 आधिकारिक आवेदन प्राप्त हो चुके हैं।

मुख्य विषयों के शिक्षकों की तैनाती सुनिश्चित करेगा शिक्षा विभाग

शिक्षा विभाग अब स्कूल मदरसों में आधुनिक शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। विभाग इन संस्थानों में गणित, विज्ञान और कंप्यूटर जैसे महत्वपूर्ण आधुनिक विषयों के योग्य शिक्षकों की नियुक्ति और पूरी व्यवस्था को करीब से देखेगा।

सरकार केवल उन्हीं स्कूल मदरसों को आधिकारिक मान्यता प्रदान करेगी जो विभाग के कड़े 20 मानकों को पूरी तरह संतुष्ट करेंगे। इन मुख्य मानकों में विषयवार समर्पित शिक्षक, पर्याप्त कक्षा-कक्ष, आधुनिक प्रयोगशाला, समृद्ध पुस्तकालय, खेल का मैदान और पीएम पोषण योजना की उपलब्धता शामिल है।

मदरसा शब्द के साथ जूनियर हाईस्कूल जोड़ना हुआ अनिवार्य

प्राधिकरण के अध्यक्ष डा. सुरजीत सिंह गांधी ने बताया कि अब शैक्षणिक संस्थानों के नाम बदलने की नई व्यवस्था लागू हो गई है। अब केवल मदरसा शब्द नहीं, बल्कि उसके साथ जूनियर हाईस्कूल या इंटरमीडिएट स्कूल शब्द जोड़ना अनिवार्य कर दिया गया है।

इस विशेष धार्मिक पाठ्यक्रम को बेहतरीन विशेषज्ञों के सहयोग से बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया है। फाइनल ड्राफ्ट तैयार होने के बाद विभिन्न धर्मगुरुओं, बोर्ड के वरिष्ठ सदस्यों और शिक्षाविदों की संयुक्त बैठक में इसे सर्वसम्मति से मंजूरी देकर तुरंत लागू कर दिया गया है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पारदर्शी व्यवस्था पर मुख्यमंत्री का बड़ा जोर

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का भव्य उद्घाटन करते हुए सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य के सभी शिक्षा के मंदिरों में उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पूर्ण पारदर्शिता और बेहतर कौशल विकास को प्राथमिकता दी जा रही है।

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि यह नया प्राधिकरण केवल मान्यता देने वाली एक साधारण संस्था मात्र नहीं बनेगा। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और उत्कृष्ट शिक्षक प्रशिक्षण का सबसे मजबूत माध्यम बनेगा। नए मान्यता प्राप्त संस्थानों को देश के प्रति समर्पित और संस्कारी नागरिक तैयार करने होंगे।

इस महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, प्रदीप बत्रा, क्षेत्रीय विधायक उमेश शर्मा काउ उपस्थित रहे। उनके साथ विशेष सचिव डा. पराग मधुकर धकाते, प्राधिकरण अध्यक्ष डा. सुरजीत सिंह सहित विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के धर्मगुरु और वरिष्ठ प्रबंधक भी मौजूद थे।

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