Premanand Maharaj Pravachan: ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा क्या है? वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने बताया भक्ति का असली अर्थ

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Mathura News: अध्यात्म और ईश्वर से जुड़ने की इच्छा रखने वाले हर इंसान के मन में यह सवाल कभी न कभी जरूर आता है कि आखिर सबसे बड़ी पूजा कौन सी है। हम अक्सर मंदिरों में घंटों प्रार्थना, कठिन व्रत और अनुष्ठान करते हैं। वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने इसका बेहद सरल जवाब दिया है।

मन, शरीर और वाणी से किसी को कष्ट न देना ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति

प्रेमानंद महाराज अपने नियमित सत्संग और प्रवचन के माध्यम से देश-विदेश के लाखों भक्तों के मन की शंकाओं को दूर करते हैं। उनके अनमोल विचारों से समाज को सही दिशा मिलती है। हाल ही में एक भक्त ने महाराज जी से पूछा था कि भगवान की सबसे बड़ी पूजा क्या है।

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महाराज जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि किसी भी इंसान को मन, शरीर और वाणी से कभी दुख नहीं पहुंचाना चाहिए। यही सृष्टि में ईश्वर की सबसे बड़ी और सच्ची पूजा है। हमारी कड़वी वाणी से किसी का दिल न दुखे, शरीर से कोई हिंसा न हो और मन में दुर्भावना न आए।

श्रीरामचरितमानस की चौपाई से संत ने समझाया धर्म का असली मर्म

अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए महाराज जी ने सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीरामचरितमानस की एक प्रसिद्ध चौपाई का उदाहरण दिया। “पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥” इस अमर पंक्ति के जरिए उन्होंने भक्तों को मानवता का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया।

इस चौपाई का अर्थ बहुत गहरा है कि दूसरों की भलाई करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इसके विपरीत किसी बेकसूर को कष्ट देने या सताने से बड़ा कोई पाप या अधर्म नहीं है। अगर आप दूसरों का भला करते हैं, तो भगवान की कृपा आपके ऊपर हमेशा बनी रहती है।

यदि आप अपने दैनिक जीवन में दूसरों को मानसिक, शारीरिक या आर्थिक चोट पहुंचाते हैं, तो आपकी पूजा व्यर्थ है। ऐसे में आप कितनी भी तीर्थ यात्रा या कठोर व्रत कर लें, भगवान आपकी भक्ति से कभी प्रसन्न नहीं होंगे। निस्वार्थ भाव से समाज सेवा करना ही सच्ची ईश्वर सेवा है।

आधुनिक जीवन में मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा पाने के लिए लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी। पूजा-पाठ के बाहरी आडंबरों को छोड़कर दूसरों के प्रति दया का भाव रखना जरूरी है। यही सीधा और सच्चा मार्ग हमें बिना किसी कठिन तपस्या के सीधे परमात्मा के करीब ले जाता है।

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