Jharkhand News: झारखंड की राजधानी रांची की प्रमुख हरमू नदी आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। कभी शहर की जीवनरेखा मानी जाने वाली यह नदी अनियोजित शहरीकरण की भेंट चढ़ गई। लगातार बढ़ते अतिक्रमण और सीवेज प्रदूषण ने इसकी सूरत पूरी तरह बिगाड़ दी है।
यह पवित्र नदी रांची शहर के ठीक बीच से गुजरते हुए स्वर्णरेखा नदी में जाकर मिलती है। दो दशक पहले तक यह नदी आसपास के बड़े इलाकों के लिए मुख्य जल स्रोत थी। हालांकि आज करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी यह नदी एक गंदे नाले में बदल चुकी है।
अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं बनीं लेकिन जमीन पर नतीजा रहा बिल्कुल शून्य
पिछले पंद्रह सालों में हरमू नदी को बचाने के लिए कई बड़ी योजनाएं शुरू की गईं। स्मार्ट सिटी मिशन से लेकर नमामि गंगे की सहयोगी परियोजनाओं तक के तहत विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की गई। टेंडर जारी हुए और सरकारी खजाने से भारी बजट भी खर्च किया गया।
अधिकारियों ने नदी तट के सौंदर्यीकरण, घाट निर्माण और ग्रीन बेल्ट विकसित करने पर खूब ध्यान दिया। हालांकि नदी की वास्तविक सेहत सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। वास्तविक सुधार के बजाय केवल नदी के किनारों पर रंग-रोगन कर विकास का दिखावा किया गया।
अंधाधुंध शहरीकरण के कारण लगातार सिकुड़ता गया नदी का प्राकृतिक विस्तार
साल उन्नीस सौ नब्बे के बाद रांची शहर का विस्तार बहुत तेजी से हुआ। इस बढ़ते शहरी दबाव का सबसे बुरा असर हरमू नदी के कैचमेंट एरिया पर पड़ा। नदी के दोनों किनारों पर धड़ल्ले से आवासीय और व्यावसायिक अवैध निर्माण कर लिए गए।
स्थानीय प्रशासन ने समय-समय पर अतिक्रमण हटाने के लिए कई बड़े अभियान जरूर चलाए। हालांकि ठोस नीति न होने से ये अभियान स्थायी परिणाम देने में पूरी तरह नाकाम रहे। कुछ समय बाद ही खाली कराई गई जमीन पर दोबारा अवैध कब्जे हो गए।
अनेक सरकारी विभागों के बीच बंटी जिम्मेदारी से बिगड़े हालात
इस नदी के संरक्षण की जिम्मेदारी रांची नगर निगम, जिला प्रशासन और नगर विकास विभाग के बीच बंटी है। जूडको जैसी सरकारी एजेंसियां भी इसमें शामिल हैं। सभी विभाग अपने स्तर पर प्रयास करने का बड़ा दावा करते हैं, लेकिन स्पष्ट जवाबदेही किसी की नहीं है।
अधिकारियों के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी के कारण निगरानी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। यही मुख्य वजह है कि जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी कोई अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ पाया है।
अनट्रीटेड सीवेज के भारी बोझ तले पूरी तरह दबी जलधारा
नदी के किनारे बसे दर्जनों मोहल्लों का गंदा पानी आज भी सीधे नदी में गिर रहा है। रांची शहर का पूरा सीवेज नेटवर्क अभी तक मुख्य शोधन प्रणाली से नहीं जुड़ पाया है। स्थापित किए गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं।
राजस्व रिकॉर्ड में नदी की सटीक जमीन और सीमाओं का चिह्नांकन न होना सबसे बड़ी कमजोरी है। जब तक सीमाएं सुरक्षित नहीं होंगी, तब तक अतिक्रमण रोकना नामुमकिन होगा। अहमदाबाद की साबरमती नदी की तर्ज पर यहां भी अब कड़े कानून और नियमित सार्वजनिक ऑडिट की सख्त जरूरत है।
Author: Rohit Mahato


