Business News: भारत के कृषि क्षेत्र और सरकारी खजाने से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आ रही है। देश का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल वित्त वर्ष 2027 तक दोगुना होकर ₹3.30 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ने की आशंका है।
ग्लोबल मार्केट में कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और घरेलू स्तर पर खेती की बढ़ती जरूरतों के कारण इस बजट में भारी उछाल देखने को मिल रहा है। सब्सिडी के इस बढ़ते बोझ से भारत के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित रखने में नीति निर्माताओं को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
किसानों को राहत देने के लिए सरकार पर बढ़ा वित्तीय बोझ
देश में खरीफ सीजन की बुवाई शुरू होने के साथ ही करोड़ों किसानों के लिए खाद की सही कीमतें बनाए रखना बेहद जरूरी है। खेती की लागत को कम रखने के लिए सरकार फिलहाल खाद की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) को पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल के दाम बढ़ने के कारण कंपनियों की लागत बढ़ गई है, जिसकी भरपाई सरकार सब्सिडी के जरिए खुद कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बढ़ते अंतर को समय रहते नहीं संभाला गया, तो इसका सीधा असर खाद्य महंगाई और सप्लाई चेन पर पड़ेगा।
राजकोषीय घाटे पर दबाव और फर्टिलाइजर सब्सिडी का गणित
सब्सिडी का बोझ बढ़ने से केंद्र सरकार को अपने बजट की कमी को पूरा करने के लिए बाजार से ज्यादा कर्ज लेना पड़ सकता है। इसका सीधा असर सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) की यील्ड और भारतीय रुपये (INR) की वैश्विक वैल्यू पर पड़ना तय माना जा रहा है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारत की आर्थिक स्थिरता को परखने के लिए राजकोषीय घाटे के इन आंकड़ों पर पैनी नजर रखते हैं। घाटे का ग्राफ ऊपर जाने से देश की अन्य जरूरी जन कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों के लिए अलॉट होने वाले फंड में कमी आ सकती है।
सब्सिडी के बढ़ते आंकड़ों पर एक नजर
अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों को देखें, तो फर्टिलाइजर सब्सिडी में लगातार बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2024 में जहां वास्तविक सब्सिडी का आंकड़ा ₹1,88,000 करोड़ था, वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह घटकर ₹1,64,000 करोड़ के स्तर पर आ गया था।
हालांकि, वित्त वर्ष 2027 के लिए जो शुरुआती अनुमान लगाए जा रहे हैं, वे बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। इस अवधि में सब्सिडी बिल के सीधे ₹3,30,000 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है, जिससे देश में आर्थिक जोखिम का स्तर सामान्य से बहुत अधिक हो जाएगा।
बुनियादी ढांचे के विकास और राज्यों के बजट पर असर
यदि कृषि क्षेत्र की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए केंद्रीय फंड का एक बड़ा हिस्सा इसी तरह डायवर्ट किया जाता रहेगा, तो इसका असर राज्यों की आर्थिक सेहत पर भी दिखेगा। इससे ग्रामीण इलाकों में सड़कों और बिजली परियोजनाओं जैसे कैपिटल एक्सपेंडिचर (CAPEX) में कटौती हो सकती है।
भले ही इस कदम से देश का अनाज उत्पादन तुरंत सुरक्षित हो जाए, लेकिन लंबे समय में यह बुनियादी ढांचे के विकास की रफ्तार को धीमा कर सकता है। आर्थिक जानकारों का स्पष्ट मानना है कि अब देश में खाद की कीमतों को लेकर एक टिकाऊ और व्यावहारिक नीति बनाना बेहद जरूरी हो गया है।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय के सामने बड़ी चुनौती
रसायन और उर्वरक मंत्रालय को इन बढ़ते आर्थिक जोखिमों के बीच देश भर के किसानों के लिए खाद की निर्बाध सप्लाई भी सुनिश्चित करनी होगी। यूरिया और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की अंतिम कीमतें अभी भी ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल और गैस के उतार-चढ़ाव पर निर्भर हैं।
भविष्य में अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिलने वाले इन झटकों से भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कड़े और दूरगामी नीतिगत सुधारों की आवश्यकता होगी। भारत की संपूर्ण आर्थिक सेहत के लिए कृषि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना और राजकोषीय घाटे को संतुलित रखना सबसे अहम प्राथमिकता है।
Author: Rajesh Kumar


