तमिलनाडु में BJP के ‘सिंघम’ का चुनावी वनवास! अन्नामलाई का टिकट कटना बड़ी रणनीति या सियासी अंत?

Tamil Nadu News: दक्षिण की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का सबसे मुखर चेहरा कहे जाने वाले के. अन्नामलाई इस बार चुनावी रणभूमि में नजर नहीं आएंगे। 3 अप्रैल को बीजेपी द्वारा जारी 27 उम्मीदवारों की सूची ने सबको चौंका दिया है। इस लिस्ट में पूर्व आईपीएस और ‘सिंघम’ के नाम से मशहूर अन्नामलाई का नाम गायब है। जबकि पार्टी ने तमिलिसाई सुंदरराजन और केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन जैसे बड़े चेहरों पर दांव लगाया है। अन्नामलाई का चुनावी मैदान से बाहर होना तमिलनाडु की राजनीति में किसी बड़े भूकंप से कम नहीं माना जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी ने अपने सबसे भरोसेमंद योद्धा को साइडलाइन कर दिया है या यह किसी बड़ी राष्ट्रीय भूमिका की तैयारी है?

टिकट कटने के पीछे की असली कहानी

अन्नामलाई ने खुद सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्होंने संगठन को मजबूत करने के लिए चुनाव न लड़ने का फैसला किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर उम्मीदवारों को बधाई देते हुए एनडीए को 210 सीटें जिताने का संकल्प दोहराया। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा कुछ और ही है। सूत्रों की मानें तो सीट चयन को लेकर सहयोगी दल AIADMK के साथ भारी मतभेद थे। अन्नामलाई कोयंबटूर क्षेत्र की अपनी पसंदीदा सीट से लड़ना चाहते थे, जबकि गठबंधन के समीकरणों में उन्हें पल्लाडम सीट ऑफर की जा रही थी। इसी खींचतान के बीच ‘सिंघम’ ने पीछे हटना ही बेहतर समझा।

AIADMK की वापसी और बीजेपी का ‘जूनियर’ रोल

तमिलनाडु में बीजेपी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। एआईएडीएमके को वापस एनडीए पाले में लाने के लिए बीजेपी ने कई समझौते किए हैं। पिछले साल अन्नामलाई ने खुद राज्य अध्यक्ष का पद इसी रणनीति के तहत छोड़ा था ताकि पुरानी सहयोगी पार्टी के साथ रिश्ते सुधर सकें। इस बार के सीट बंटवारे में एआईएडीएमके 169 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि बीजेपी महज 27 सीटों पर सिमट गई है। यह साफ संकेत है कि तमिलनाडु में बीजेपी अब जूनियर पार्टनर की भूमिका स्वीकार कर चुकी है और अन्नामलाई की आक्रामक शैली इस नए रिश्ते में शायद फिट नहीं बैठ रही थी।

क्या अब दिल्ली में जमेगा अन्नामलाई का सिक्का?

चुनावी मैदान से हटने का मतलब अन्नामलाई की राजनीति का अंत कतई नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही संकेत दे चुके हैं कि अन्नामलाई की क्षमताओं का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर किया जाएगा। हाल ही में उन्हें मुंबई जैसे शहरों में पार्टी प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी। जानकारों का मानना है कि बीजेपी उन्हें दक्षिण भारत के लिए अपना मुख्य रणनीतिकार बनाकर दिल्ली बुला सकती है। विधानसभा चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी छोड़ने के पीछे भले ही उनके पिता की तबीयत बताई गई हो, लेकिन सच यही है कि अन्नामलाई अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकलने की तैयारी में हैं।

त्रिकोणीय मुकाबले के बीच बीजेपी का प्रयोग

तमिलनाडु में इस बार चुनावी जंग काफी दिलचस्प है। सत्ताधारी DMK और विपक्षी NDA के बीच सीधा मुकाबला तो है ही, लेकिन अभिनेता विजय की राजनीतिक एंट्री ने इसे त्रिकोणीय बना दिया है। 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले अन्नामलाई को रेस से बाहर रखना बीजेपी का एक बड़ा जुआ है। अगर यह रणनीति काम कर गई तो अन्नामलाई का कद पार्टी में और बढ़ेगा, वरना तमिलनाडु में बीजेपी के अस्तित्व पर फिर से सवाल खड़े होंगे। अब 4 मई के नतीजे ही बताएंगे कि ‘सिंघम’ का यह मौन बीजेपी के लिए वरदान साबित होता है या अभिशाप।

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