मिडल-ईस्ट के महायुद्ध से दुनिया में हाहाकार! क्या अब पेट्रोल-डीजल की होगी राशनिंग? जेब पर पड़ेगा भारी बोझ

World News: मध्य-पूर्व (मिडल-ईस्ट) में गहराते युद्ध के बाद अब पूरी दुनिया के सिर पर ऊर्जा संकट का काला साया मंडराने लगा है। यूरोपीय संघ (EU) ने दुनिया को आगाह किया है कि ईरान और इजरायल के बीच छिड़ा यह भीषण संघर्ष एक लंबे ऊर्जा अकाल की शुरुआत हो सकता है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि अब यूरोपीय देशों में ईंधन की राशनिंग (सीमित वितरण) और इमरजेंसी तेल भंडारों के इस्तेमाल पर चर्चा शुरू हो गई है। यह संकट न केवल आपकी गाड़ी की रफ्तार रोकेगा, बल्कि रसोई का बजट भी पूरी तरह बिगाड़ने वाला है।

ऊर्जा की ऊंची कीमतों के साथ जीना होगा, यूरोपीय संघ की दो टूक

यूरोपीय संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि अब सस्ती ऊर्जा के दिन लद चुके हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले दिनों में जेट फ्यूल और डीजल की सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा सकती है। ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ में बढ़ते तनाव और खाड़ी देशों के तेल बुनियादी ढांचे पर हमलों ने ईंधन की उपलब्धता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। ईयू का मानना है कि यह संकट हफ्तों नहीं, बल्कि महीनों तक खिंच सकता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ईंधन की कीमतें एक नए शिखर को छू सकती हैं।

फरवरी से अप्रैल 2026: तेल और गैस की कीमतों में ऐतिहासिक आग

पिछले दो महीनों में कच्चे तेल और गैस के दामों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। आंकड़ों के जरिए समझिए कि आपकी जेब पर कितना भार बढ़ा है:

  • कच्चा तेल: फरवरी 2026 के अंत तक जो तेल 70-73 डॉलर प्रति बैरल पर मिल रहा था, वह मार्च आते-आते 112 डॉलर के पार निकल गया। अप्रैल की शुरुआत में भी यह 110 डॉलर के खतरनाक स्तर के आसपास मंडरा रहा है।
  • प्राकृतिक गैस: युद्ध की आग ने गैस की कीमतों में 75% तक की भीषण तेजी ला दी है। एशियाई एलएनजी (LNG) की कीमतें फरवरी से अब तक 140% से भी ज्यादा उछल चुकी हैं।

रसोई के बजट पर दोहरा हमला: खाने-पीने की चीजें भी होंगी महंगी

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने बेहद डराने वाली चेतावनी दी है। ऊर्जा संकट का सीधा असर अब खेतों तक पहुँच गया है। मार्च में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक पिछले कई महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है। यूएन के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो का कहना है कि अगर यह युद्ध 40 दिनों से ज्यादा चला, तो खेती की लागत इतनी बढ़ जाएगी कि किसान बुवाई ही कम कर देंगे। इसका मतलब है कि आने वाले समय में अनाज की पैदावार घटेगी और महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ देगी।

खाद और परिवहन की लागत बढ़ाएगी किसानों की मुसीबत

ऊर्जा संकट सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। बिजली और ईंधन की कमी से खाद (फर्टिलाइजर) का उत्पादन और परिवहन महंगा हो गया है। जब खेतों में खाद डालना और फसल को बाजार तक ले जाना महंगा होगा, तो थाली का निवाला भी कीमती हो जाएगा। दुनिया भर के अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि मिडिल-ईस्ट की यह चिंगारी अब एक वैश्विक आर्थिक मंदी और भुखमरी की ओर इशारा कर रही है। अब देखना यह है कि दुनिया की महाशक्तियां इस संकट से निपटने के लिए क्या रास्ता निकालती हैं।

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