Punjab News: गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार कानून को चुनौती, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की वैधता पर ही खड़े किए सवाल

Punjab News: पंजाब सरकार के ‘जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम-2026’ को लेकर कानूनी विवाद गहरा गया है। शुक्रवार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। हालांकि, अदालत ने मुख्य कानून पर बहस करने से पहले याचिकाकर्ता ‘एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया’ की अपनी विधिक स्थिति और प्राधिकरण पर ही गंभीर सवाल उठा दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक याचिकाकर्ता की वैधता सिद्ध नहीं होती, तब तक इस संवेदनशील मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकती।

धार्मिक भेदभाव और समानता के अधिकार का मुद्दा

एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया की ओर से दायर इस याचिका में पंजाब सरकार पर सीधा निशाना साधा गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि वर्ष 2008 के मूल कानून और 2026 के नए संशोधन के माध्यम से सरकार ने एक विशिष्ट धार्मिक ग्रंथ (श्री गुरु ग्रंथ साहिब) को विशेष कानूनी संरक्षण दिया है। याचिका में दावा किया गया है कि यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 25 और 26 का उल्लंघन है। चर्च का कहना है कि धर्मनिरपेक्ष देश में किसी एक धर्म के ग्रंथ को वरीयता देना संवैधानिक ढांचे के खिलाफ है।

बाइबल और अन्य ग्रंथों को समान संरक्षण की मांग

अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता पक्ष ने दलील दी कि धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान की मूल संरचना है। ऐसे में यदि सरकार किसी एक धर्म के ग्रंथ को विशेष सुरक्षा देती है, तो वही सुरक्षा पवित्र बाइबल और अन्य धार्मिक ग्रंथों को भी मिलनी चाहिए। चर्च का आरोप है कि अन्य ग्रंथों को समान दर्जा न देना धार्मिक आधार पर भेदभाव की श्रेणी में आता है। साथ ही, याचिका में अनुच्छेद 254 के तहत केंद्र और राज्य के विधायी टकराव (समवर्ती सूची) का तकनीकी मुद्दा भी उठाया गया है।

पंजाब सरकार ने याचिका की वैधता को दी चुनौती

सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने आक्रामक रुख अपनाते हुए याचिका की वैधता पर ही प्रहार किया। सरकारी वकील ने सवाल उठाया कि याचिका दाखिल करने वाला व्यक्ति किस विधिक अधिकार से चर्च का प्रतिनिधित्व कर रहा है। सरकार ने चर्च के भीतर वर्ष 2013 से चले आ रहे नेतृत्व विवाद, प्रतिद्वंद्वी गुटों के दावों और वेबसाइट पर मौजूद विरोधाभासी जानकारियों का हवाला दिया। सरकार का आरोप है कि याचिका के साथ संलग्न प्राधिकरण दस्तावेज (Authority Letters) प्रामाणिक नहीं हैं और उन पर परिषद सदस्यों के स्पष्ट हस्ताक्षर तक मौजूद नहीं हैं।

अदालत ने मांगा विस्तृत जवाब, 14 मई तक टली सुनवाई

हाई कोर्ट की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सख्त रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि किसी भी कानून की संवैधानिक चुनौती जैसे बड़े मुद्दे पर विचार करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि याचिकाकर्ता पक्ष वास्तव में सक्षम और अधिकृत है। अदालत ने याची पक्ष को अपने प्रतिनिधित्व और अधिकारिता के दावों पर विस्तृत हलफनामा और सहायक दस्तावेज दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई 14 मई 2026 को होगी।
पंजाब सरकार के इस विशेष कानून और उस पर चर्च की आपत्ति को लेकर आपकी क्या राय है? क्या धार्मिक ग्रंथों के लिए विशेष सजा का प्रावधान सही है?

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