New Delhi News: देश की सर्वोच्च अदालत ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून को मजबूत करने की दिशा में एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को जनता से छुपाया नहीं जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त की मुख्य जांच शाखा स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (एसपीई) कोई खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं है। यही बड़ी वजह है कि इसे आरटीआई के दायरे से बाहर बिल्कुल नहीं रखा जा सकता।
न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और न्यायमूर्ति एएस चंदूरकर की पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए मध्य प्रदेश सरकार की 25 अगस्त 2011 की पुरानी अधिसूचना को पूरी तरह से रद कर दिया है, जिसके तहत एसपीई को छूट मिली थी।
इसी अधिसूचना के माध्यम से तत्कालीन राज्य सरकार ने एसपीई को आरटीआई कानून की जवाबदेही के दायरे से चालाकी से बाहर कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस कदम को पूरी तरह से कानून के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध और अवैध बताया है।
खुफिया या सुरक्षा मामलों की जांच का नहीं है कोई अधिकार
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिस कानूनी व्यवस्था के तहत एसपीई का गठन हुआ है, उसे देखते हुए इसे खुफिया एजेंसी नहीं माना जा सकता। यह शाखा केवल मध्य प्रदेश लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम 1981 की धारा 7 के मामलों में सहायता करती है।
माननीय अदालत ने कानून की व्याख्या करते हुए बिल्कुल साफ कर दिया कि देश की संप्रभुता, खुफिया और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े बेहद संवेदनशील मामलों की जांच करने का कोई भी कानूनी अधिकार न तो लोकायुक्त को प्राप्त है और न ही उप-लोकायुक्त को है।
राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी अधिसूचनाएं मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, भारतीय दंड संहिता की धारा 409 (आपराधिक न्यासभंग) और धारा 420 (धोखाधड़ी) तक ही सीमित हैं। लोकसेवकों से जुड़े इन अपराधों की जानकारी अब आरटीआई के माध्यम से जनता को आसानी से मिल सकेगी।
Author: Vijay Chouhan


