Stubble Burning Punjab: पराली जलाने की जिद या मजबूरी? सीईईडब्ल्यू के नए सर्वे में किसानों के व्यवहार को लेकर हुआ चौंकाने वाला खुलासा

Punjab News: पंजाब में पराली यानी फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर एक नया और स्वतंत्र अध्ययन सामने आया है। ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर’ (सीईईडब्ल्यू) की इस रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में पराली न जलाने के व्यवहार को स्थायी बनाने के लिए अब किसानों की मानसिकता पर आधारित नई संचार रणनीतियां अपनानी होंगी।

संस्थान का यह नया स्वतंत्र सर्वे साफ बताता है कि अब तक चल रहे सभी के लिए एक जैसे घिसे-पिटे समाधानों से आगे बढ़ना होगा। साल 2022 से भले ही पराली जलाने के मामलों में कुछ कमी दर्ज की गई है, लेकिन किसानों द्वारा इसे जलाने के तरीके में अब काफी बड़ा बदलाव आया है।

सैटेलाइट ट्रैकिंग की सीमाओं के कारण जमीनी सच्चाई अलग

अध्ययन के मुताबिक सैटेलाइट से पराली का पता लगाने की अपनी कुछ तकनीकी सीमाएं होती हैं। इसलिए अब सटीक आंकड़ों के विश्लेषण के लिए किसानों के व्यवहार, उनके द्वारा पराली जलाने के समय और सरकारी विकल्पों को अपनाने की असल रफ्तार को ध्यान में रखना बेहद जरूरी हो गया है।

संस्थान ने पंजाब के चार प्रमुख जिलों में 102 किसानों के बीच एक प्राथमिक सर्वे किया है। इस दौरान फोकस ग्रुप चर्चाओं और जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों से लंबी बातचीत की गई। इस बातचीत के आधार पर ही विशेषज्ञों ने कुछ बेहद हैरान करने वाले व्यावहारिक निष्कर्ष निकाले हैं।

अविश्वास और वित्तीय तंगी के कारण फैसले बदल रहे किसान

अध्ययन में पाया गया कि सही सूचनाओं की कमी के अलावा सामाजिक मान्यताएं, आपसी अविश्वास और कमजोर वित्तीय स्थिति जैसी व्यावहारिक बाधाएं किसानों के फैसलों को प्रभावित कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्थानीय दिक्कतों को सही और प्रभावी क्षेत्रीय संचार के जरिए आसानी से दूर किया जा सकता है।

सीईईडब्ल्यू की सीनियर फेलो प्रार्थना बोराह ने मंगलवार को मीडिया को इस सर्वे की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पंजाब ने पराली जलाने की घटनाओं को रोकने में अच्छी प्रगति की है। हालांकि इस सुधार को जमीन पर हमेशा बरकरार रखने के लिए व्यापक जागरूकता अभियानों की जरूरत है।

पराली जलाने को गलत मानते हैं ज्यादातर भारतीय किसान

सीईईडब्ल्यू का यह स्वतंत्र अध्ययन दिखाता है कि वर्तमान में किसानों के नेक इरादों में कोई कमी नहीं है। राज्य के कई किसान पहले से ही खेतों में पराली जलाने को पर्यावरण के लिए पूरी तरह गलत मानते हैं। वे इससे बचने के लिए नए वैज्ञानिक विकल्पों को अपनाने की लगातार कोशिश भी कर रहे हैं।

हालांकि बड़ी चुनौती यह है कि किसानों तक बिल्कुल सटीक समय पर और भरोसेमंद माध्यमों से व्यावहारिक मार्गदर्शन नहीं पहुंच पा रहा है। किसान अक्सर फसलों पर कीटों के अचानक हमले, आधुनिक मशीनों के महंगे उपयोग, अधिक लागत और कटाई के लिए मिलने वाले बहुत सीमित समय से परेशान रहते हैं।

डिजिटल माध्यमों से ज्यादा कृषि अधिकारियों पर बढ़ा भरोसा

इस विशेष सर्वे में शामिल लगभग 62 प्रतिशत किसानों ने सरकारी एग्रीकल्चर एक्सटेंशन ऑफिसर्स पर अपना सबसे बड़ा भरोसा जताया है। इसके बाद किसान सूचनाओं के लिए अपने साथी किसानों की सलाह पर विश्वास करते हैं। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि विश्वसनीयता बनाने के लिए आमने-सामने की बातचीत ही सबसे जरूरी है।

भले ही आज के दौर में डिजिटल माध्यमों और मोबाइल ऐप्स का कवरेज बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन किसान आज भी व्यक्तिगत संवाद को ज्यादा महत्व देते हैं। किसानों ने बताया कि वर्तमान में चल रहे प्रशिक्षण सत्र मुख्य रूप से केवल लंबे व्याख्यान यानी लेक्चर पर ही आधारित होते हैं।

ट्रेनिंग सत्रों में खेतों पर व्यावहारिक प्रदर्शन की भारी कमी

किसानों के अनुसार इन सरकारी ट्रेनिंग सत्रों में खेतों पर जाकर व्यावहारिक प्रदर्शन यानी लाइव डेमोंस्ट्रेशन की भारी कमी दिखती है। इसके अलावा खेती की मशीन किराए पर लेने वाले सर्वे में शामिल 56 प्रतिशत किसानों ने आधुनिक मशीनें अपने साथी किसानों से ही आपसी तालमेल के जरिए हासिल की थीं।

वहीं केवल 34 प्रतिशत किसानों ने इसके लिए सरकारी कस्टम हायरिंग सेंटर्स की मदद ली थी। यह बात साबित करती है कि आपसी सहयोग और मशीनों तक आसान पहुंच ही व्यवहार परिवर्तन का मुख्य जरिया है। अध्ययन ने ‘आंशिक रूप से पराली जलाने वाले’ किसानों की पहचान एक विशेष समूह के रूप में की है।

कीटों के हमले के डर से आंशिक रूप से जलती है पराली

यह आंशिक रूप से पराली जलाने वाले ऐसे किसान हैं, जो फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों का उपयोग तो करते हैं, लेकिन कीटों के भीषण हमले के डर से थोड़ी-बहुत पराली खेतों में ही जला देते हैं। सर्वे के मुताबिक करीब 67 प्रतिशत किसानों ने कीटों के डर को ही इसकी मुख्य वजह बताया है।

अध्ययन का मुख्य सुझाव है कि किसानों के इस व्यावहारिक डर को दूर करने के लिए विशेष तकनीकी समाधान तैयार किए जाने चाहिए। इसके साथ ही कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सीधे खेतों में जाकर लाइव प्रदर्शन जैसे कदम उठाने से इस गंभीर समस्या का एक स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

Author: Gurpreet Singh

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