मंडी जिला अदालत का बड़ा फैसला: पत्नी कमाने में सक्षम हो तो भी गुजारा भत्ता देना पति की जिम्मेदारी

Himachal News: हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की सत्र अदालत ने घरेलू हिंसा मामले में पति की अपील खारिज कर दी है। न्यायालय ने निचली अदालत के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पति को 4,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने को कहा गया था। सत्र न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि पत्नी के शिक्षित होने मात्र से उसे वित्तीय सहायता से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने महंगाई को देखते हुए इस राशि को बुनियादी जरूरत बताया है।

घरेलू हिंसा और ससुराल पक्ष पर प्रताड़ना के आरोप

लगधर निवासी कांता देवी का विवाह वर्ष 2015 में विजय कुमार के साथ हुआ था। कांता देवी ने आरोप लगाया कि ससुराल वालों ने शादी के बाद ही उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। अंततः उसे घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद वह किराये के मकान में रहने को मजबूर हुई। कांता देवी ने अदालत को बताया कि उसके पास आजीविका का कोई साधन नहीं है। उसने पति से गुजारा भत्ता दिलाने की गुहार लगाई थी।

पति की बीमारी की दलील को अदालत ने किया खारिज

अपीलकर्ता विजय कुमार ने कोर्ट में तर्क दिया था कि वह रक्त संबंधी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। उसने दावा किया कि बीमारी के कारण वह भारी काम नहीं कर सकता और उसकी आय केवल 3,000 रुपये है। उसने पत्नी पर ब्यूटी पार्लर से पैसे कमाने की क्षमता होने का भी आरोप लगाया। हालांकि, सत्र न्यायालय ने इन दलीलों को पुराना और अपर्याप्त बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पति अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

शिक्षित पत्नी के हक पर अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सत्र न्यायाधीश ने अपने निर्णय में एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है। अदालत ने माना कि यदि पत्नी शिक्षित है या कमाने में सक्षम है, तो भी पति उसे गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है। वर्तमान समय की महंगाई में 4,000 रुपये की राशि बहुत अधिक नहीं है। न्यायालय ने पति की बीमारी के दावों को जिम्मेदारी से बचने का बहाना बताया। अब दोनों पक्षों को 25 मई को दोबारा ट्रायल कोर्ट में पेश होना होगा।

अदालत ने दिए सख्त अनुपालन के निर्देश

न्यायालय ने इस फैसले के जरिए समाज में कड़ा संदेश दिया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने साफ कहा कि वैवाहिक विवादों में पति अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। ट्रायल कोर्ट के 9 दिसंबर 2024 के फैसले को बरकरार रखते हुए उच्च अदालत ने अपील को पूरी तरह आधारहीन माना। अब पति को हर महीने तय समय पर पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता देना होगा। पुलिस और प्रशासन को आदेश के पालन की निगरानी करने को कहा गया है।

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