कोलकाता नगर निगम चुनाव 2026: भाजपा की प्रचंड लहर में ढहा तृणमूल का अभेद्य किला

West Bengal News: पश्चिम बंगाल की सत्ता संरचना में आए ऐतिहासिक बदलाव के बाद अब सबकी निगाहें कोलकाता नगर निगम पर टिकी हैं। हालिया विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ‘लुक ईस्ट’ नीति ने बड़ी सफलता हासिल की है। इस जीत ने तृणमूल कांग्रेस के सबसे मजबूत दुर्ग ‘छोटा लालबाड़ी’ यानी कोलकाता नगर निगम की नींव हिला दी है। चुनावी रुझानों ने स्पष्ट कर दिया है कि जिसे तृणमूल अपना अभेद्य किला मानती थी, वहां अब भाजपा का कमल खिलने के लिए जमीन पूरी तरह तैयार हो चुकी है।

वार्डों के आंकड़ों में भाजपा की बड़ी बढ़त

कोलकाता नगर निगम के चुनावी विश्लेषण के अनुसार कुल 144 वार्डों में से भाजपा ने 101 वार्डों में निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है। इसके विपरीत, सत्ता से बेदखल हुई तृणमूल कांग्रेस अब महज 43 वार्डों तक सिमटती नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव के इन नतीजों ने आगामी दिसंबर में होने वाले निगम चुनावों के लिए राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। भाजपा की इस बढ़त ने कोलकाता के शहरी मतदाताओं के बीच पार्टी की बढ़ती स्वीकार्यता पर मुहर लगा दी है।

असंतोष और हार के डर से जूझती तृणमूल

आगामी निगम चुनावों को लेकर राज्य का सियासी पारा अभी से चढ़ गया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर गहरा असंतोष और आगामी हार का डर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का दबी जुबान में मानना है कि राज्य की सत्ता हाथ से जाने के बाद कोलकाता नगर निगम को बचाना लगभग असंभव है। कसबा, तिलजला और राजाबाजार जैसे अल्पसंख्यक बहुल इलाकों को छोड़कर पार्टी के पास अब कोई मजबूत और सुरक्षित गलियारा नहीं बचा है।

भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज ने बिगाड़ा खेल

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि स्थानीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और ‘सिंडिकेट राज’ ने मध्यमवर्गीय शहरी मतदाताओं को पूरी तरह नाराज कर दिया है। पिछले 15 वर्षों के दौरान जिस तरह से प्राकृतिक जलाशयों को भरकर अवैध निर्माणों को बढ़ावा दिया गया, उससे आम जनता में गहरा रोष था। अब राज्य में भाजपा की नई सरकार के शपथ ग्रहण के साथ ही स्थानीय नेताओं को अपने अस्तित्व और सुरक्षा की चिंता सताने लगी है, क्योंकि जनता अब पारदर्शिता की मांग कर रही है।

अन्य निगमों में भी बड़े बदलाव की सुगबुगाहट

कोलकाता के साथ-साथ राज्य के अन्य प्रमुख नगर निगमों में भी बड़े राजनीतिक फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। विधाननगर, हावड़ा, आसनसोल और सिलीगुड़ी जैसे नगर निगमों में भी तृणमूल कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई है। राज्य में हुए इस बड़े सत्ता परिवर्तन का असर स्थानीय निकायों के प्रशासन पर भी पड़ना तय है। आने वाले समय में इन सभी शहरों के प्रशासनिक ढांचे और राजनीतिक नेतृत्व में व्यापक फेरबदल देखने को मिल सकते हैं, जो भाजपा की नई नीति का हिस्सा होंगे।

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