New Delhi News: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन की सफलता के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा, शारीरिक क्षमता और मानसिक मजबूती को परखने के लिए इसरो ने लद्दाख के लेह में ‘मिशन मित्रा’ की शुरुआत की है। शून्य से नीचे के तापमान और कम ऑक्सीजन वाले इस दुर्गम इलाके में गगनयात्रियों को अंतरिक्ष जैसी भयानक परिस्थितियों का सामना करना सिखाया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष उड़ान के दौरान किसी भी आपात स्थिति में चालक दल की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
क्या है मिशन मित्रा और क्यों चुना गया लद्दाख का बर्फीला रेगिस्तान?
‘मिशन मित्रा’ (मैपिंग ऑफ इंटरऑपरेबल ट्रेट्स एंड रिस्पांस असेसमेंट) अपनी तरह का पहला व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन है। इसे इसरो और भारतीय वायुसेना के ‘एयरोस्पेस मेडिसिन संस्थान’ ने संयुक्त रूप से तैयार किया है। लेह को इस अभ्यास के लिए इसलिए चुना गया है क्योंकि यहां 3,500 मीटर की ऊंचाई पर हाड़ कंपाने वाली ठंड और ऑक्सीजन की भारी कमी (हाइपोक्सिया) होती है। यह दुर्गम वातावरण काफी हद तक अंतरिक्ष के शून्य माहौल से मेल खाता है। इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन द्वारा लांच किया गया यह अभ्यास 2 से 9 अप्रैल तक चलेगा। इसमें अंतरिक्ष यात्रियों के व्यवहार और विपरीत परिस्थितियों में उनके शरीर की प्रतिक्रियाओं का बारीकी से आकलन किया जा रहा है।
अंतरिक्ष के तनाव में कैसे काम करेगा इंसानी दिमाग?
मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन में मशीनों से ज्यादा इंसानी दिमाग और शरीर का परीक्षण होता है। जब अंतरिक्ष यात्री धरती से सैकड़ों किलोमीटर दूर होते हैं, तो बेहतर संचार, तनाव झेलने की क्षमता और आपसी तालमेल ही उनकी ढाल बनता है। मिशन मित्रा के माध्यम से इसरो यह जांच रहा है कि भयंकर दबाव के बीच गगनयात्रियों की निर्णय क्षमता कैसी रहती है। इस एनालॉग मिशन से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि गहरे अंतरिक्ष में अकेलेपन और भारी तनाव के बीच टीम के सदस्य कैसे व्यवहार करते हैं। यही सटीक तालमेल गगनयान मिशन की असली सफलता और अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी तय करेगा।


