RBI Polymer Currency: भारतीय नोटों के इतिहास में सबसे बड़ा उलटफेर, अब कागज़ की जगह जेब में चमचमाएंगे प्लास्टिक के नोट

Delhi News: भारतीय रिज़र्व बैंक देश की मुद्रा व्यवस्था में एक क्रांतिकारी बदलाव करने पर बहुत गंभीरता से विचार कर रहा है। देश में जल्द ही कागज़ के पारंपरिक नोटों की जगह पॉलीमर यानी प्लास्टिक के नोट देखने को मिल सकते हैं। अगर यह बड़ा प्रस्ताव मंज़ूर हो जाता है, तो यह भारतीय करेंसी के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है।

यह नई पहल साल 2016 में हुई नोटबंदी के बाद भारतीय बैंकिंग इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव होगी। पॉलीमर नोट एक खास तरह के उच्च गुणवत्ता वाले प्लास्टिक मटीरियल से तैयार किए जाते हैं। यह मैटेरियल आम कागज़ी नोटों की तुलना में कहीं ज़्यादा मज़बूत, सुरक्षित और बेहद टिकाऊ माना जाता है।

क्यों खास होते हैं ये आधुनिक प्लास्टिक नोट?

प्लास्टिक या पॉलीमर से बने ये नोट आसानी से बिल्कुल नहीं फटते हैं। इन नोटों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये पानी में भी पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं और खराब नहीं होते। भारत की बदलती जलवायु और नोटों के रफ इस्तेमाल की स्थितियों को देखते हुए इन पर नमी और गंदगी का कोई खास असर नहीं पड़ता है।

इन अनूठी खूबियों के कारण प्लास्टिक नोटों की औसत उम्र कागज़ के नोटों के मुकाबले दो से चार गुना तक बढ़ जाती है। हालांकि शुरुआत में इन नोटों की उत्पादन लागत थोड़ी ज़्यादा होती है, लेकिन इनकी लंबी उम्र के कारण बार-बार छपाई की ज़रूरत कम हो जाती है। इससे अंततः सरकार के अरबों रुपयों की भारी बचत होगी।

नोट छापने पर खर्च होते हैं देश के अरबों रुपये

भारत में करेंसी नोट छापने की सालाना लागत हमेशा से बहुत ज़्यादा बनी हुई है। आरबीआई के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में करेंसी नोट छापने का कुल खर्च ₹6,372 करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। हालांकि वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह खर्च थोड़ा घटकर ₹4,875 करोड़ के स्तर पर आ गया था।

इससे पहले साल 2016-17 में नोटबंदी और नए नोटों को जारी करने के कारण यह छपाई लागत रिकॉर्ड ₹7,965 करोड़ तक जा पहुंची थी। नए नोटों की छपाई तो समस्या का सिर्फ़ एक हिस्सा है। सबसे बड़ी चुनौती बाज़ार में लगातार खराब और गंदे होने वाले पुराने नोटों की भारी मात्रा को बदलने से पैदा होती है।

सर्कुलेशन से बाहर किए गए अरबों खराब नोट

रिज़र्व बैंक के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में सर्कुलेशन से रिकॉर्ड संख्या में खराब नोट हटाए गए हैं। बाज़ार से हटाए गए नोटों में सबसे बड़ी संख्या ₹500 के नोटों (5.983 अरब नोट) और ₹100 के नोटों (5.811 अरब नोट) की रही है। इन खराब नोटों के निपटान और नए नोटों को लाने में भारी प्रशासनिक खर्च होता है।

दुनिया भर के 60 से ज़्यादा देशों में वर्तमान में प्लास्टिक नोटों का इस्तेमाल बहुत सफलता के साथ किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को शुरू करने वाला दुनिया का सबसे पहला देश था। इसके बाद कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, रोमानिया और यूके जैसे कई देशों ने पॉलीमर करेंसी को पूरी तरह या आंशिक रूप से अपना लिया है।

भारत में पहले भी हो चुका है इसका छोटा ट्रायल

भारत ने इससे पहले साल 2012 में पॉलीमर नोटों का एक सीमित परीक्षण किया था। हालांकि उस समय यह सरकारी पहल केवल एक पायलट प्रोजेक्ट चरण से आगे नहीं बढ़ पाई थी। लेकिन अब बदलती तकनीक और लगातार बढ़ती लागत को देखते हुए आरबीआई इस प्रस्ताव पर दोबारा बहुत सक्रियता से काम कर रहा है।

तेजी से डिजिटल होती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अब मुद्दा सिर्फ़ ज़्यादा करेंसी छापने का नहीं रह गया है। केंद्रीय बैंक का पूरा ध्यान अब मुख्य रूप से नोटों की उम्र बढ़ाने और उनके रखरखाव की भारी लागत को कम करने पर केंद्रित है। प्लास्टिक नोट इस समस्या का सबसे सटीक और दीर्घकालिक समाधान पेश करते हैं।

Author: Rajesh Kumar

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