चइती छठ का समापन: डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रतियों ने मनाई आस्था

Chhath Puja News: रविवार से शुरू हुआ चइती छठ पर्व आस्था, अनुशासन और पारंपरिक रौनक के साथ संपन्न हो गया। चार दिनों तक चले इस कठिन व्रत में महिलाओं ने कड़े नियमों का पालन करते हुए डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया। संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के साथ ही व्रत का समापन हुआ। शहर के विभिन्न घाटों पर करीब 300 लोगों की मौजूदगी में पूजा का खास माहौल देखने को मिला।

सूर्य को अर्घ्य के साथ दिखी आस्था की अलग झलक

चइतीछठ के तीसरे और चौथे दिन घाटों पर आस्था का अनोखा दृश्य देखने को मिला। संध्या अर्घ्य के लिए शाम होते ही लोग घाटों पर पहुंचने लगे। वहीं अगले दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। पारंपरिक सूप, फल और प्रसाद के साथ पूरे विधि-विधान से पूजा की गई। एक साथ जुटे सैकड़ों लोगों ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। हर तरफ भजन और पूजा का वातावरण था।

चार दिन, सख्त नियम और अनुशासन

यह पर्व चार दिनोंका कठिन व्रत है। नहाय-खाय से शुरुआत होती है और खरना के बाद संध्या व उषा अर्घ्य तक हर दिन का अलग महत्व है। व्रती महिलाओं को खान-पान से लेकर व्यवहार तक कई नियमों का पालन करना होता है। लंबे समय तक उपवास और शुद्धता का विशेष ध्यान इस व्रत को और कठिन बनाता है। इसके बावजूद हर साल महिलाएं पूरे समर्पण के साथ इसे निभाती हैं।

परिवार के लिए, परंपरा के साथ

चइतीछठ का मुख्य उद्देश्य परिवार की खुशहाली, अच्छी सेहत और शांति की कामना करना होता है। सूर्य देव और छठी मैया की पूजा के जरिए लोग अपने जीवन में सकारात्मकता और संतुलन बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। यह पर्व सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि परिवार और परंपरा को जोड़ने का माध्यम भी है। हर घर में इसे लेकर अलग ही उत्साह और श्रद्धा देखने को मिलती है।

व्रतियों ने साझा किया अपना अनुभव

पिछलेआठ सालों से यह व्रत कर रही बिंदु ने कहा, ‘हर बार जब अर्घ्य देती हूं तो एक अलग सुकून महसूस होता है। यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि परिवार की भलाई और मन की शांति से जुड़ा हुआ है।’ वहीं छह सालों से चइती छठ कर रही लक्ष्मी ने बताया, ‘व्रत कठिन जरूर है, लेकिन इससे मन को संतोष मिलता है। परिवार के लिए यह करना मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है।’

शहर में हर साल बनता है खास माहौल

शहर मेंयह पर्व सीमित स्तर पर मनाया जाता है, लेकिन हर साल इसका माहौल खास होता है। जो परिवार इसे करते हैं, वे पूरे समर्पण के साथ तैयारियां करते हैं और परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। इस बार भी चार दिनों तक घाटों और घरों में पूजा-पाठ का माहौल बना रहा। संध्या और उषा अर्घ्य के दौरान एक साथ जुटे लोगों ने इस पर्व को यादगार बना दिया।

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