Delhi News: क्या आपने कभी खुद यह महसूस किया है कि बाहर बारिश शुरू होने से ठीक पहले अचानक आपके सिर में तेज दर्द होने लगता है? अगर हां, तो यह केवल आपकी कोई मनगढ़ंत सोच या वहम बिल्कुल नहीं है।
दुनिया भर में बहुत से लोगों के लिए मौसम में होने वाला अचानक और तीव्र बदलाव भयंकर सिरदर्द और माइग्रेन का एक बड़ा कारण बन सकता है। हाल के दिनों में उत्तर भारत के मौसम में बड़े बदलाव देखे गए हैं।
लगातार चलती भयंकर हीटवेव, धूल भरी तेज आंधियां और असमय हो रही अनियमित बारिश ने लोगों को इस शारीरिक दर्द का सामना करने पर मजबूर कर दिया है। पिछले हफ्तों में राजस्थान का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार कर गया था।
तापमान और वायुमंडलीय दबाव का खेल
दिल्ली-एनसीआर में भी भारी बारिश और आंधी का दौर देखा गया। ये बदलाव भले ही चिलचिलाती गर्मी से फौरी राहत देते हों, लेकिन हमारे शरीर और सिरदर्द के लिए एक बहुत ही अनुकूल परिस्थितियां भी पैदा कर देते हैं।
मौसम के बदलते ही सिर फटने का सबसे मुख्य और वैज्ञानिक कारण वायुमंडलीय दबाव (बैरोमेट्रिक प्रेशर) में आने वाली भारी कमी है। वायुमंडलीय दबाव असल में हमारे चारों ओर मौजूद हवा का वास्तविक वजन होता है।
आमतौर पर किसी भी क्षेत्र में बारिश और भयंकर तूफान आने से ठीक पहले वहां का वायुमंडलीय दबाव बहुत तेजी से नीचे गिरता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हवा का यह बदलाव हमारे साइनस पर सीधा असर डालता है।
साइनस और रक्त वाहिकाओं पर पड़ता है सीधा असर
दबाव कम होने से हमारे चेहरे के साइनस और सिर की रक्त वाहिकाओं (ब्लड वेसल्स) का आपसी दबाव संतुलन पूरी तरह प्रभावित हो जाता है। इसी वजह से मौसम के प्रति संवेदनशील लोगों में तेज सिरदर्द शुरू हो जाता है।
विशेष रूप से माइग्रेन के पुराने रोगियों के लिए हवा के इस दबाव में होने वाली जरा सी भी कमी कभी-कभी उनके माइग्रेन के भयंकर हमले को अचानक ट्रिगर करने के लिए पूरी तरह काफी होती है।
इसके साथ ही गर्मियों की खतरनाक लहरें भी अपने साथ कई तरह की शारीरिक समस्याएं लेकर आती हैं। लगातार उच्च तापमान के सीधे संपर्क में रहने से शरीर में तेजी से निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) का खतरा बढ़ जाता है।
मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाती पर्याप्त ऑक्सीजन
जब हमारा शरीर तेज पसीने के माध्यम से जरूरी तरल पदार्थ खो देता है, तो नसों में रक्त की कुल मात्रा कम हो जाती है। इससे हमारे मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्वों का पहुंचना कठिन हो जाता है।
इसका सीधा परिणाम हमें भयंकर चक्कर आने, लगातार शरीर में थकान रहने और एक बेहद असहनीय सिरदर्द के रूप में भुगतना पड़ता है। इसके अलावा हवा में उड़ने वाली धूल भरी आंधियां भी इस समस्या को कई गुना बढ़ा देती हैं।
हाल की आंधियों ने हवा में धूल, महीन परागकण और अन्य खतरनाक प्रदूषक कणों को पूरी तरह भर दिया है। ये कण हमारी आंखों, नाक और पूरे श्वसन तंत्र को भीतर तक बुरी तरह परेशान और संक्रमित कर देते हैं।
धूल के कणों से बढ़ता है साइनस का दर्द
संवेदनशील लोगों के लिए हवा की यह गंभीर परेशानी आगे चलकर साइनस के तेज सिरदर्द का मुख्य कारण बनती है। शहर की बेहद खराब वायु गुणवत्ता मौजूदा माइग्रेन के लक्षणों को और ज्यादा दर्दनाक बना देती है।
बारिश थमने के बाद भी तापमान में होने वाला अचानक उतार-चढ़ाव हमारे पूरे नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है। कुछ माइग्रेन रोगियों का कहना है कि हवा में अचानक बढ़ी हुई नमी (ह्यूमिडिटी) माइग्रेन के हमलों को बार-बार शुरू कर देती है।
तेज ठंडी हवाएं, रात की आंधियों के कारण टूटने वाली नींद और बदलता तापमान इस दर्द के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं। हालांकि, कुछ बेहद सरल और अच्छी आदतों को अपनाकर आप इस दर्द से आसानी से बच सकते हैं।
इस मौसमी दर्द से बचने के आसान और अचूक उपाय
इस मौसमी दर्द से बचने के लिए खुद को हमेशा पूरी तरह हाइड्रेटेड रखें और दिनभर में पर्याप्त पानी पीते रहें। तेज धूप में बाहर निकलते समय हमेशा अच्छी क्वालिटी का धूप का चश्मा (सनग्लासेस) पहनना कभी न भूलें।
धूल भरी आंधियों के दौरान घर से बाहर कम से कम समय बिताएं। अपने सोने और जागने का एक नियमित टाइम टेबल फॉलो करें। अत्यधिक गर्मी के समय लंबे समय तक सीधे सूरज की रोशनी के संपर्क में रहने से बचें।
जो लोग अक्सर माइग्रेन का अनुभव करते हैं, वे बदलते मौसम के पैटर्न के साथ अपने लक्षणों को एक डायरी में ट्रैक कर सकते हैं। इससे उन्हें अपने व्यक्तिगत ट्रिगर्स की सटीक पहचान करने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी।
Author: Asha Thakur


