लक्षण दिखने से पहले ही जानलेवा बीमारियों को रोक देगा ये टेस्ट, हर महिला को 16 की उम्र के बाद जरूर कराना चाहिए

Delhi News: हमारे देश में अक्सर महिलाएं अपने खुद के स्वास्थ्य के प्रति उतनी सजग नहीं रहती हैं, जितनी उन्हें होना चाहिए। महिलाओं को लंबी और सुरक्षित जिंदगी जीने के लिए समय-समय पर जरूरी मेडिकल जांच के वास्तविक महत्व को गंभीरता से समझना होगा।

हमारा शरीर हमेशा किसी भी बीमारी की शुरुआत में छोटे-छोटे हिंट्स या संकेत देता है। लेकिन सही जानकारी के अभाव में महिलाएं इन्हें पूरी तरह इग्नोर कर देती हैं। ऐसे में समय पर की गई नियमित जांच से किसी भी बड़ी और जानलेवा बीमारी को टाला जा सकता है।

आइए जानते हैं कि आधुनिक जेनेटिक टेस्टिंग किस प्रकार महिलाओं के जीवन में गंभीर बीमारियों के बड़े जोखिम को बहुत हद तक कम कर सकती है। लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों से लेकर रीप्रोडक्टिव चुनौतियों तक, जेनेटिक टेस्टिंग 16 से 60 साल तक की महिलाओं के लिए वरदान है।

सर्वाइकल और ब्रेस्ट कैंसर की एडवांस स्क्रीनिंग

भारत में 15 वर्ष से अधिक उम्र की करोड़ों महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर होने का सबसे बड़ा खतरा रहता है। देश में हर साल करीब 1.23 लाख से ज्यादा महिलाओं में इस घातक बीमारी का निदान होता है, जिनमें से हजारों महिलाएं अपनी कीमती जान गंवा देती हैं।

सर्वाइकल कैंसर भारत में कम उम्र की महिलाओं में पाया जाने वाला दूसरा सबसे आम और खतरनाक कैंसर है। यह जानलेवा बीमारी मुख्य रूप से एचपीवी संक्रमण के कारण फैलती है। इसलिए 16 से 25 साल की युवतियों के लिए इसकी समय पर स्क्रीनिंग कराना बेहद महत्वपूर्ण होता है।

इसके साथ ही सही समय पर एचपीवी स्क्रीनिंग कराने और उचित टीकाकरण की मदद से सर्वाइकल कैंसर को पूरी तरह बढ़ने से रोका जा सकता है। इसके अलावा महिलाओं में होने वाला खतरनाक ब्रेस्ट कैंसर और ओवेरियन कैंसर भी शरीर के बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन्स में अनुवांशिक म्यूटेशन के कारण जन्म लेता है।

आने वाली पीढ़ी के लिए कैरियर स्क्रीनिंग है जरूरी

लगभग 18 से 40 साल की उम्र की महिलाओं में जेनेटिक कैरियर स्क्रीनिंग कराने से शरीर के भीतर छिपी कई अनुवांशिक समस्याओं का आसानी से पता चल जाता है। इस एडवांस टेस्ट की मदद से इन घातक बीमारियों के बच्चों में ट्रांसफर होने के जोखिम का सटीक आकलन किया जा सकता है।

यह टेस्ट मुख्य रूप से डुशेन मस्कुलर डिस्ट्रफी, हेमोफिलिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस, थैलेसेमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी बेहद दर्दनाक बीमारियों को रोकने में बहुत मददगार साबित होता है। समय पर इस जांच को कराकर आने वाले शिशु को पूरी तरह सुरक्षित और सेहतमंद बनाया जा सकता है।

आईवीएफ के दौर में प्रिइंप्लांटेशन जेनेटिक टेस्ट

आजकल असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी यानी आईवीएफ (IVF) ने महिलाओं के लिए गर्भधारण की प्रक्रिया को कुछ हद तक काफी आसान बना दिया है। लेकिन महिलाओं को सफल गर्भधारण करने से पहले बिल्कुल नया इनोवेशन प्रि-इंप्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग टेस्ट (पीजीटी) जरूर करवाना चाहिए।

इस आधुनिक पीजीटी टेस्ट की मदद से आईवीएफ द्वारा तैयार किए गए भ्रूण को महिला के गर्भ में स्थापित करने से पहले ही बहुत बारीकी से एग्जामिन कर लिया जाता है। इससे भ्रूण के भीतर मौजूद सभी जेनेटिक और अनुवांशिक बीमारियों का पहले ही सटीक पता चल जाता है।

इसके माध्यम से गंभीर जेनेटिक बीमारियों को मासूम बच्चों में ट्रांसफर होने की संभावना को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। इस टेस्ट द्वारा आईवीएफ की बेहतर सफलता दर और गर्भपात (मिसकैरेज) के भारी जोखिम को भी काफी हद तक कम किया जाना पूरी तरह सुनिश्चित हो जाता है।

गर्भवती महिलाओं के लिए आरएचडी और जेनेटिक जांच

गर्भवती महिलाओं की आरएचडी स्क्रीनिंग का मुख्य उद्देश्य मां और ओवरी के बीच मौजूद आरएच फैक्टर का सही पता लगाना होता है। इससे प्रेग्नेंसी के दौरान अचानक होने वाली जटिलताओं या बार-बार होने वाले गर्भपात के छिपे कारणों को आसानी से समझा जा सकता है।

प्रेग्नेंसी की बिल्कुल शुरुआत में ही आरएचडी-नेगेटिव मांओं की सही पहचान करके डॉक्टर उन्हें आरएच इम्युनोग्लोबुलिन का जरूरी इंजेक्शन दे सकते हैं। इससे होने वाली मां और गर्भ में पल रहा शिशु दोनों ही पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित रहते हैं।

जेनेटिक स्क्रीनिंग की मदद से शरीर द्वारा दिए जाने वाले किसी भी बाहरी लक्षण से पहले ही अंदरूनी बीमारी के बारे में जाना जा सकता है। डायबिटीज, हाइपरटेंशन, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, पार्किंसंस, अल्जाइमर और मोटापा जैसी बीमारियों का इस जांच की मदद से बहुत पहले पता लगाया जा सकता है।

Author: Asha Thakur

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