वाराणसी के गंगा घाट पर इफ़्तार और बिरयानी विवाद का पूरा सच, 60 दिन जेल के बाद कैसे मिली 14 लड़कों को ज़मानत?

Varanasi News: धर्म की नगरी वाराणसी में गंगा नदी के नमो घाट पर एक नाव में इफ़्तार करना 14 मुस्लिम युवकों को भारी पड़ गया। रमज़ान के दौरान चिकन बिरयानी खाने और हड्डियाँ गंगा में फेंकने के आरोपों के बाद मचे सियासी बवाल ने पुलिस को सख्त कार्रवाई के लिए मजबूर किया। दो महीने जेल में रहने के बाद अब उन्हें ज़मानत मिली है।

वाराणसी के अस्सी घाट पर शाम का माहौल हमेशा की तरह सामान्य था, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने सब कुछ बदल दिया। बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष की शिकायत पर पुलिस ने धार्मिक भावनाएं आहत करने सहित कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया। इसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ जल अधिनियम भी लगाया गया।

गंगा में इफ़्तार का वीडियो और पुलिस की एफ़आईआर

मार्च 2026 में दर्ज इस एफ़आईआर में पुलिस ने पहले सात धाराएं लगाई थीं। शिकायत में कहा गया कि पावन गंगा में मांस खाना और अवशेष फेंकना हिंदू आस्था पर गहरा प्रहार है। प्रशासन ने शुरुआती जांच के बाद आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सात साल से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं थी।

इस हाई-प्रोफाइल मामले में मोड़ तब आया जब पुलिस ने आरोपियों की न्यायिक हिरासत मांगते समय एक नई धारा 308(5) जोड़ दी। यह धारा जबरन वसूली से संबंधित है, जो एक गैर-जमानती अपराध है। इसमें दस साल की सजा का प्रावधान है। पुलिस का दावा था कि नाविकों के बयान के आधार पर यह धारा जोड़ी गई है, ताकि मामले को मजबूती मिले।

अदालत में धाराओं का खेल और पुलिस का यू-टर्न

सेशन कोर्ट में सुनवाई के दौरान पुलिस ने जल प्रदूषण निवारण अधिनियम की धारा 24 को खुद ही हटा दिया। इसका मतलब यह था कि नदी में हड्डियाँ फेंकने के ठोस साक्ष्य नहीं मिले। वकीलों के अनुसार, बिना फॉरेंसिक रिपोर्ट के प्रदूषण का आरोप साबित करना कठिन था। फिर भी, सार्वजनिक जलाशय को गंदा करने की बीएनएस धारा बरकरार रखी गई।

वाराणसी नगर निगम ने भी स्पष्ट किया कि गंगा में नाव पर भोजन करने को लेकर कोई विशिष्ट नियम नहीं है। हालांकि, पुलिस का तर्क है कि मामला सीधे तौर पर धार्मिक आस्था से जुड़ा है। एसीपी विजय प्रताप सिंह ने कहा कि भले ही फॉरेंसिक सबूत न हों, लेकिन गवाहों के बयान और वायरल वीडियो आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त आधार पेश करते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट से बिना शर्त माफी और रिहाई

मदनपुरा के रहने वाले इन युवकों का परिवार इस विवाद के बाद से गहरे डर में है। 60 दिनों तक जेल में बंद रहने के बाद, मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने आरोपियों की ओर से दाखिल हलफनामे को गंभीरता से लिया। इसमें युवकों ने समाज और हिंदू समुदाय की भावनाएं आहत होने पर बिना शर्त लिखित माफी मांगी थी।

जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने ज़मानत देते समय पुलिस द्वारा जोड़ी गई जबरन वसूली की धारा पर संदेह जताया। कोर्ट ने कहा कि नाविक खुद शिकायत करने नहीं आया था, बल्कि जांच के दौरान उसने बयान बदला। आरोपियों के पछतावे और भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने के वादे के बाद उन्हें जेल से रिहा करने का आदेश दिया गया।

इस पूरे मामले में अभी चार्जशीट दाखिल होना बाकी है, जिससे पुलिस की तफ्तीश की असलियत सामने आएगी। युवकों के परिवारों ने मीडिया से दूरी बना ली है और इसे महज एक अनजाने में हुई गलती बता रहे हैं। वाराणसी का यह मामला अब कानूनी दांवपेच और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच एक बड़ी नजीर बन चुका है।

Author: Ajay Mishra

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