Delhi News: देश की सर्वोच्च अदालत ने स्कूलों में छात्राओं की बुनियादी सुविधाओं को लेकर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि देश की बेटियों को सेनिटरी नैपकिन और अलग शौचालय की कमी के कारण अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए।
जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सोमवार को इस संवेदनशील मामले की सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार को अपने पुराने निर्देशों का हर हाल में पूरी तरह पालन सुनिश्चित कराने का हुक्म दिया है। शीर्ष अदालत ने लैंगिक समानता और शिक्षा के अधिकारों पर विशेष जोर दिया।
मासिक धर्म स्वच्छता और शौचालय पर शीर्ष अदालत सख्त
केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि 30 जनवरी के फैसले के बाद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस दिशा में तेजी से काम शुरू हो गया है। उस फैसले में देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सेनिटरी नैपकिन देने का आदेश जारी हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से अपनी प्रशासनिक शक्तियों का अधिकतम इस्तेमाल करने को कहा। अदालत ने नसीहत दी कि लड़कियों को सिर्फ इसलिए घर बैठकर घरेलू काम नहीं करना चाहिए क्योंकि स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है।
सुप्रीम कोर्ट हर तीन महीने में करेगी प्रगति की निगरानी
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का सही मार्गदर्शन करे। साथ ही इस कल्याणकारी योजना के क्रियान्वयन से जुड़ा सारा डेटा भी एकत्र करे। शीर्ष अदालत इस पूरे मामले की जमीनी प्रगति की खुद निगरानी करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
इस फैसले के तहत केंद्र सरकार को अब हर तीन महीने में अदालत के समक्ष प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने 30 जनवरी को दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में साफ किया था कि लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सभी स्कूलों में अलग शौचालय और नैपकिन देना अनिवार्य है।
Author: Adv Anuradha Rajput


