Environment News: आज की दुनिया में युद्ध सिर्फ इंसानों की जान और संपत्ति नहीं छीन रहे, बल्कि धरती के भविष्य को भी गंभीर खतरे में डाल रहे हैं। अनुमान के अनुसार, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 5.5 फीसदी हिस्सा सैन्य गतिविधियों से आता है। अगर सभी सेनाओं को एक देश मान लिया जाए, तो वे दुनिया के चौथे सबसे बड़े उत्सर्जक बन जाएंगे।
सैन्य अभ्यास और युद्ध में भारी ऊर्जा खपत
आधुनिक युद्धोंमें फाइटर जेट, टैंक, युद्धपोत, मिसाइल और ड्रोन भारी मात्रा में ईंधन जलाते हैं। एक लड़ाकू विमान प्रति घंटे कई टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर सकता है। सैन्य अभ्यास, हथियार निर्माण और लॉजिस्टिक्स भी लगातार ऊर्जा खपत बढ़ाते हैं। ज्यादातर देश अपनी सैन्य उत्सर्जन रिपोर्टिंग को पारदर्शी नहीं रखते, जिससे असली आंकड़े और भी ज्यादा हो सकते हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध का उदाहरण
रूस-यूक्रेन युद्ध इसकाज्वलंत उदाहरण है। अब तक इस संघर्ष से 311 मिलियन टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्सर्जन हो चुका है, जो कई यूरोपीय देशों के पूरे साल के उत्सर्जन के बराबर है। तेल भंडारण केंद्रों पर हमले, जलते ऑयल वेल्स और औद्योगिक ढांचे की तबाही से हवा, पानी और मिट्टी जहरीली हो जाती है।
दीर्घकालिक प्रदूषण और एसिड रेन
युद्ध केदौरान निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें पानी के साथ मिलकर एसिड रेन पैदा करती हैं। यह बारिश मिट्टी की उर्वरता घटाती है, फसलों को नुकसान पहुंचाती है और जल स्रोतों को दूषित कर देती है। जलते तेल कुओं से उठने वाला काला धुआं महीनों तक आसमान को ढके रखता है, जिससे सूरज की रोशनी कम हो जाती है और स्थानीय मौसम चक्र बिगड़ जाता है।
युद्ध का असर दशकों तक रहता है
युद्ध काअसर युद्धकाल तक सीमित नहीं रहता। बम, लैंडमाइन और हथियारों के अवशेष मिट्टी और पानी में जहरीले रसायन छोड़ते हैं, जो दशकों तक खेती और पीने के पानी को प्रभावित करते रहते हैं। समुद्री हमलों से समुद्री जीवन नष्ट होता है, जबकि विस्थापित लोग ईंधन के लिए जंगलों को काटते हैं। पुनर्निर्माण के दौरान भारी निर्माण कार्य फिर से पर्यावरण पर दबाव बढ़ाता है।
शांति ही सच्चा जलवायु समाधान
जलवायुविशेषज्ञ चेताते हैं कि युद्ध न सिर्फ तत्काल प्रदूषण बढ़ाते हैं, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग को तेज करके मौसम की अनियमितता, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाओं को बढ़ावा देते हैं। फिर भी, अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में सैन्य उत्सर्जन को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शांति स्थापना ही सच्चा जलवायु समाधान हो सकता है। जब तक युद्ध जारी रहेंगे, हमारी पृथ्वी का हर कोना प्रभावित होगा। आज की लड़ाई कल के मौसम को और खराब कर रही है।


