Middle East News: डोनाल्ड ट्रम्प की धमकियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच एक ऐसा मोड़ आया है जिसने पूरी दुनिया को उलझा दिया है। 48 घंटे के कड़े अल्टीमेटम के बाद अचानक ट्रम्प के सुरों में नरमी और ‘5 दिनों के ब्रेक’ की चर्चा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ईरान के साथ होने वाली सीधी भिड़ंत फिलहाल टल गई है या यह किसी बड़ी सैन्य रणनीति का हिस्सा है? इस रहस्यमयी खामोशी ने मध्य पूर्व के समीकरणों को एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
ट्रम्प ने हाल ही में ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर बंधकों की रिहाई और क्षेत्रीय शांति पर बात नहीं बनी, तो उसे भारी कीमत चुकानी होगी। उनके इस बयान के बाद युद्ध की आशंकाएं गहरा गई थीं। लेकिन अचानक आई इस ‘खामोशी’ ने विश्लेषकों को चौंका दिया है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि पर्दे के पीछे कुछ ऐसी कूटनीतिक खिचड़ी पक रही है, जिसकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।
ईरान और अमेरिका के बीच इस खींचतान का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ रहा है। ट्रम्प का यह ‘यू-टर्न’ उनके समर्थकों के लिए मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, लेकिन विरोधियों के लिए यह केवल वक्त काटने की रणनीति है। कूटनीति की इस बिसात पर शह और मात का खेल जारी है, जहाँ हर कदम बहुत फूंक-फूंक कर रखा जा रहा है।
कूटनीति का नया खेल: क्या दबाव की राजनीति काम कर रही है?
जानकारों का मानना है कि ट्रम्प का 48 घंटे वाला अल्टीमेटम केवल ईरान पर मानसिक दबाव बनाने के लिए था। जब ईरान ने अपनी मिसाइल क्षमताओं का प्रदर्शन किया, तो वाशिंगटन ने अपनी रणनीति बदल ली। यह 5 दिनों का अंतराल शायद बातचीत के गुप्त रास्तों को खोलने का एक जरिया हो सकता है। दुनिया अब यह समझने की कोशिश कर रही है कि क्या ट्रम्प वास्तव में युद्ध चाहते हैं या सिर्फ बेहतर डील।
ईरान के भीतर भी इस स्थिति को लेकर काफी हलचल है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। अमेरिका के भीतर भी इस रुख को लेकर दो फाड़ दिख रहे हैं। कुछ लोग इसे ट्रम्प की बहादुरी बता रहे हैं, तो कुछ इसे एक खतरनाक खेल मान रहे हैं जिससे मध्य पूर्व में आग लग सकती है।
इस बीच, इजरायल की भूमिका भी काफी अहम हो गई है। इजरायल लगातार अमेरिका पर दबाव बना रहा है कि ईरान के परमाणु ठिकानों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। ट्रम्प के इस नए रुख से तेल अवीव में भी बेचैनी बढ़ी है। क्या अमेरिका अपने सबसे भरोसेमंद साथी को भरोसे में लेकर यह कदम उठा रहा है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
आर्थिक प्रतिबंधों की मार और युद्ध का डर: आम जनता का क्या?
ईरान की आम जनता पहले से ही कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की मार झेल रही है। युद्ध की आहट ने वहां के बाजारों में महंगाई और अनिश्चितता बढ़ा दी है। दूसरी तरफ, अमेरिका में भी लोग एक और लंबी जंग में शामिल होने के पक्ष में नहीं हैं। ट्रम्प इस जनभावना को समझते हैं, इसलिए वे शायद सीधे सैन्य एक्शन के बजाय ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सोशल मीडिया पर इस अल्टीमेटम के खत्म होने और नए ब्रेक को लेकर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं। कुछ लोग इसे ट्रम्प की पीछे हटने की मजबूरी कह रहे हैं, तो कुछ इसे ‘खामोशी से पहले का तूफान’। सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं छिपी है। मध्य पूर्व के रेगिस्तान में बारूद की गंध अभी कम नहीं हुई है, बस चिंगारी को थामने की कोशिश हो रही है।
आने वाले 5 दिन इस पूरे क्षेत्र का भविष्य तय करेंगे। क्या ईरान झुकने को तैयार होगा या अमेरिका अपनी धमकियों को हकीकत में बदलेगा? रवीश कुमार के शब्दों में कहें तो, यह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है, बल्कि दुनिया की शांति और सत्ता की भूख के बीच का संघर्ष है। हम केवल इंतजार कर सकते हैं और उम्मीद कि विवेक की जीत हो।

