खेती में बड़ा बदलाव: बुंदेलखंड में गो आधारित प्राकृतिक खेती के लिए ‘फार्मर आईडी’ अनिवार्य, खातों में आएगी सहायता राशि

Lucknow News: उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में गो आधारित प्राकृतिक खेती योजना का लाभ उठाने वाले अन्नदाताओं के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण खबर है। कृषि विभाग ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए जारी नई कार्ययोजना में ‘फार्मर रजिस्ट्री’ यानी फार्मर आईडी को पूरी तरह अनिवार्य कर दिया है।

सरकार ने बुंदेलखंड में इस महत्वाकांक्षी योजना के व्यापक विस्तार के लिए यह कड़ा कदम उठाया है। आंकड़ों के मुताबिक, योजना के तहत अब तक कुल 11,750 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र और लगभग 11,740 किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती की इस विशेष मुहिम से सीधे जोड़ा जा चुका है।

गंगा किनारे विकसित हो रहे विशेष क्लस्टर

कृषि विभाग की इस विशेष योजना के तहत बुंदेलखंड और गंगा नदी के किनारे बसे विभिन्न जिलों में बड़े एग्रीकल्चर क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं। वर्ष 2022-23 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के पहले चरण में बुंदेलखंड के सात प्रमुख जिलों में कुल 235 क्लस्टर सफलतापूर्वक तैयार किए गए हैं।

इन जिलों में झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट शामिल हैं। इन क्लस्टरों के माध्यम से स्थानीय किसानों को रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अपनी निर्भरता को कम करने तथा देशी गाय के गोबर-मूत्र पर आधारित पारंपरिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

डीबीटी से मिलेगी 1200 रुपये की मदद

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा किसानों को देशी बीज प्रबंधन और हरी खाद (ग्रीन मैन्योरिंग) तैयार करने के लिए वित्तीय मदद भी दी जा रही है। पात्र किसानों को 1200-1200 रुपये प्रति हेक्टेयर की यह विशेष सहायता राशि सीधे उनके बैंक खातों में डीबीटी (DBT) के माध्यम से भेजी जाती है।

योजना के पहले चरण में फार्मर आईडी की कोई अनिवार्यता लागू नहीं थी, लेकिन अब विभाग ने सभी जुड़े हुए किसानों को अनिवार्य रूप से अपनी आईडी बनवाने के निर्देश दिए हैं। जिन किसानों के पास अभी तक यह विशिष्ट पहचान पत्र नहीं है, उन्हें जल्द से जल्द पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करने की सलाह दी गई है।

दूसरे चरण का है अंतिम वर्ष

कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, योजना के दूसरे चरण का यह अंतिम वर्ष है, इसलिए सभी क्लस्टर्स को अब पूरी क्षमता के साथ संचालित किया जाएगा। इस बार किसानों के उत्पादों के शुद्धता प्रमाणीकरण, कीटनाशक अवशेष परीक्षण, मृदा स्वास्थ्य परीक्षण (सॉइल टेस्टिंग) और कूटनीतिक विपणन विकास पर विशेष जोर रहेगा।

किसानों की प्राकृतिक उपज को बाजार में बेहतर दाम दिलाने के लिए उन्हें सीधे किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और विशेष जैविक बाजारों से जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग से प्राकृतिक खेती की पैदावार बढ़ाने पर उच्च स्तरीय अनुसंधान भी कराया जाएगा।

Author: Ajay Mishra

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