वाग्देवी प्रतिमा का रहस्य: 250 किलो की अद्भुत मूर्ति, जिसे लार्ड कर्जन चुराकर ले गए लंदन!

Dhar News: मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा, समृद्ध संस्कृत अध्ययन और अटूट सांस्कृतिक चेतना का एक महान प्रतीक रही है। परमार वंश के प्रतापी राजा भोज के काल में स्थापित इस पावन भोजशाला को मां वाग्देवी यानी सरस्वती की आराधना, उच्च वैदिक अध्ययन और बड़े-बड़े विद्वानों के प्रमुख केंद्र के रूप में विश्वभर में विशिष्ट पहचान मिली थी।

इस ऐतिहासिक परिसर का विशाल स्थापत्य, नक्काशीदार स्तंभ, प्राचीन यज्ञकुंड और मां वाग्देवी की अलौकिक प्रतिमा इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। प्राचीन काल में यहां भव्य धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, वैदिक आयोजन और विशेष रूप से वसंत पंचमी महोत्सव बड़े धूमधाम से आयोजित होते थे। इस परिसर से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित ज्ञानपुरा गांव के बारे में माना जाता है कि परमार काल में यह महान आचार्यों का निवास स्थान था।

नालंदा और तक्षशिला जैसी थी भोजशाला की ख्याति

राजा भोज के समय की विद्वता और शिल्प वैभव की यह अद्भुत धरोहर आज भी इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करती है। वर्ष 1034 ईस्वी में राजा भोज ने धार में एक विशाल आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। इसे ही आज भोजशाला के नाम से जाना जाता है। यह महान शिक्षण संस्थान अपने दौर में नालंदा और तक्षशिला जैसी समृद्ध भारतीय शिक्षा परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था।

वसंत पंचमी के पावन दिन पर ही यहां मां सरस्वती की दिव्य प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी। लगभग 271 वर्षों तक यह पवित्र स्थान पूरी दुनिया में शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बना रहा। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह दुर्लभ मूर्ति तत्कालीन मूर्तिकला कौशल की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है। इतिहासकारों के अनुसार यह अद्वितीय प्रतिमा मूल रूप से चार भुजाओं वाली और दिव्य कलाकृतियों से सुसज्जित थी।

मेजर जनरल ने करवाई थी खोदाई, कर्जन ले गए लंदन

न्यायालय में सुनवाई के दौरान इस ऐतिहासिक मूर्ति से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। बताया गया कि वर्ष 1875 में ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि मेजर जनरल विलियम किकेड ने इस मंदिर परिसर की खोदाई करवाई थी। इस दौरान मुस्लिम शासकों द्वारा वहां छिपाकर गाड़ी गई वाग्देवी की मूर्ति को बाहर निकाला गया था। इसके बाद वर्ष 1903 में लार्ड कर्जन इस बेसकीमती मूर्ति को अपने साथ लंदन ले गए।

संस्कृत और देवनागरी लिपि में लिखे हैं साक्ष्य

लार्ड कर्जन द्वारा लंदन ले जाए जाने के बाद से यह दुर्लभ प्रतिमा आज तक वहीं के एक संग्रहालय में रखी हुई है। देवी के सिर पर बना आकर्षक मुकुट और सुसज्जित केश विन्यास उनकी दिव्यता और गरिमा को बखूबी दर्शाते हैं। इस मूर्ति के आधार भाग पर संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में प्राचीन अभिलेख उकेरे गए हैं। इसके अनुसार वररुचि नामक विद्वान ने वाग्देवी सहित तीन सुंदर प्रतिमाओं का निर्माण करवाया था।

पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार सफ़ेद संगमरमर की यह ऐतिहासिक मूर्ति लगभग 128.5 सेंटीमीटर ऊंची और 58.6 सेंटीमीटर चौड़ी है। इसका अनुमानित भार करीब 250 किलोग्राम माना जाता है। इस ऐतिहासिक जानकारी के सामने आने के बाद अब देश भर में इस प्राचीन मूर्ति को वापस भारत लाने की मांग एक बार फिर बहुत तेजी से उठने लगी है। लोग अपनी सांस्कृतिक धरोहर को वापस देखना चाहते हैं।

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